रांची, 27 अगस्त (आईएएनएस)। इस रक्षाबंधन पर झारखंड के गांवों से प्यार और परंपरा के ताने-बाने से बुने रेशमी धागे केवल भाइयों की कलाई ही नहीं सजा रहे, बल्कि राज्य की हजारों ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी में आत्मनिर्भरता की नई चमक भी बिखेर रहे हैं। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी से संबद्ध राज्यभर के सखी मंडलों से जुड़ी दीदियों द्वारा तैयार की गई हस्तनिर्मित 'पलाश' और 'अदिवा' ब्रांड वाली राखियां इस बार बाजार में आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्यवासियों से सखी मंडल की बहनों के हुनर का सम्मान करने की अपील करते हुए गुरुवार को सोशल मीडिया पर लिखा, 'हर वर्ष की तरह इस बार भी हमारी सखी मंडल की माताओं-बहनों ने अपने स्नेह, हुनर और मेहनत से खूबसूरत राखियां तैयार की हैं। आपकी खरीदी सिर्फ एक राखी नहीं, बल्कि किसी बहन के आत्मविश्वास और स्वावलंबन का सम्मान है।'
महिलाओं के हाथों तैयार राखियों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए राज्य के सभी जिलों में विशेष ‘पलाश स्टॉल’ लगाए गए हैं। पश्चिमी सिंहभूम, हजारीबाग, पूर्वी सिंहभूम, कोडरमा, पाकुड़ और सिमडेगा सहित कई अन्य जिलों में पलाश आउटलेट्स पर हस्तनिर्मित राखियों की जबर्दस्त बिक्री हो रही है। पलामू जिले में लेस्लीगंज, पड़वा और नावाबाजार प्रखंड की महिलाओं को 40,000 राखियां बनाने का लक्ष्य दिया गया, जिसे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से पूरा किया।
पलामू उपायुक्त दिलीप प्रताप सिंह शेखावत सहित कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने कुछ दिन पहले इन केंद्रों पर पहुंचकर सखी मंडल की दीदियों से कलाई पर राखी बंधवाई और 'लोकल फॉर वोकल' का संदेश दिया। दुमका के शादीपुर गांव में 'महादेव सखी मंडल' की महिलाओं ने स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों, साटन, रेशम और चमकीले मोतियों का उपयोग कर पर्यावरण-अनुकूल राखियां बनाई हैं।
गुणवत्ता, फिनिशिंग और डिजाइनों के मामले में ग्रामीण महिलाओं के हाथों से बनी ये राखियां बाजार में बाहरी और प्लास्टिक-सिंथेटिक राखियों को कड़ी टक्कर दे रही हैं। थोक मूल्य 8 से 10 रुपये के बीच रखे जाने से महिलाओं को प्रति राखी 4 से 5 रुपये की सीधी बचत हो रही है, जिससे त्योहार के मौसम में उनके परिवारों को बेहतर आर्थिक संबल मिल रहा है।
--आईएएनएस
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