नई दिल्ली, 18 जून (आईएएनएस)। मौजूदा समय में आधुनिकता की चमक के बीच अगर कोई चीज हमें हमारी पहचान से जोड़ती है तो वह है हमारी संस्कृति, परंपराएं और विरासत। यही कारण है कि हर वर्ष 19 जून को विश्व एथनिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन केवल पारंपरिक वेशभूषा पहनने या सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी सभ्यता और उन मूल्यों को याद करने का अवसर है जिन्होंने समाज और मानवता को आकार दिया है।
वैश्वीकरण के दौर में आज जब स्थानीय कलाएं, लोक संस्कृतियां और पारंपरिक जीवनशैली कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तब विश्व एथनिक दिवस हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश देता है।
विश्व एथनिक दिवस का उद्देश्य दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों के प्रति सम्मान और जागरूकता बढ़ाना है। इस दिन कला, संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत, सभ्यता और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर विशेष जोर दिया जाता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है और संस्कृति का संरक्षण ही उसके भविष्य की सुरक्षा है।
इसके साथ-साथ कई देशों में 19 जून को विश्व जातीय दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न समुदायों, जनजातियों और सांस्कृतिक समूहों की विशिष्ट पहचान को सम्मान देना तथा उनकी परंपराओं को संरक्षित करना है।
विश्व एथनिक दिवस की अवधारणा एथनिक उत्पादों को बढ़ावा देने वाली एक प्रमुख ऑनलाइन पहल से जुड़ी मानी जाती है। इसका मूल उद्देश्य दुनिया भर में फैले भारतीय समुदायों और विभिन्न प्रवासी समूहों को अपनी कला, संस्कृति, विरासत और सभ्यता का उत्सव मनाने के लिए प्रेरित करना था। समय के साथ यह दिवस एक वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है, जो लोगों को अपनी जड़ों से जुड़ने और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है।
भारत विश्व की सबसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देशों में से एक है। यहां विभिन्न धर्म, भाषाएं, समुदाय और परंपराएं एक साथ विकसित हुई हैं। प्रत्येक धर्म के अपने रीति-रिवाज, त्योहार और जीवन मूल्यों की अलग पहचान है, लेकिन इन सबको जोड़ने वाला सूत्र आपसी सम्मान और सहअस्तित्व है।
विश्व एथनिक दिवस केवल परंपराओं के उत्सव से कहीं बढ़कर आत्ममंथन का अवसर है। यह दिन हमें महसूस कराता है कि बदलते समय के साथ कई लोक कलाएं, कलाकार और सांस्कृतिक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। कलाकारों का पलायन, पारंपरिक शिल्पों की घटती मांग और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव ने कई सांस्कृतिक विरासतों को संकट में डाल दिया है। ऐसे में यह दिन कला और कलाकारों के संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाने का संदेश देता है। ऐतिहासिक विरासत, विज्ञान, मानव सभ्यता, लोककला और संस्कृति को बचाने का दायित्व केवल सरकारों का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का है।
हमारे देश में संस्कृतियों की भी अनूठी छटा देखने को मिलती है। पंजाब का भांगड़ा है तो गुजरात का गरबा। दक्षिण भारत में भरतनाट्यम की शास्त्रीय गरिमा है तो केरल में कथकली की रंगमंचीय भव्यता। इसी तरह, उत्तर भारत में लोकगीतों की मधुर परंपरा है तो पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान। भारत की इसी सांस्कृतिक विविधता और एकता को दुनिया भर में सराहा जाता है।
ऐसा माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी संस्कृति और मूल्यों से जुड़कर ही समग्र विकास कर सकता है। संस्कृति केवल पहनावे या खान-पान तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन जीने की कला, सामाजिक व्यवहार, नैतिक मूल्यों और सामूहिक स्मृतियों का भी आधार होती है। यह दिवस हमें संदेश देता है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखना आवश्यक है।
--आईएएनएस
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