Advertisement banner

गालिब की जिंदगी से लेकर द्रौपदी तक…सुरेंद्र वर्मा की कलम ने हर किरदार को दी नई पहचान

गालिब

नई दिल्ली, 6 सितंबर (आईएएनएस)। सुरेंद्र वर्मा हिन्दी साहित्य और रंगमंच की दुनिया का ऐसा नाम हैं, जिन्होंने इतिहास, मिथक और इंसानी रिश्तों को अपनी अलग नजर से देखा। उन्होंने पुराने किरदारों और कहानियों को सिर्फ दोहराया नहीं बल्कि उन्हें आज के समाज और आधुनिक सोच से जोड़कर पेश किया। कालिदास हों, द्रौपदी हों या मिर्जा गालिब, उनकी कलम ने इन जाने-पहचाने चेहरों के भीतर छिपे उन सवालों को सामने रखा, जिन पर आमतौर पर कम बात होती है।

सुरेंद्र वर्मा का जन्म 7 सितंबर 1941 को उत्तर प्रदेश के झांसी में हुआ था। उन्होंने भाषा विज्ञान में एमए की पढ़ाई की। करियर की शुरुआत शिक्षक के तौर पर की लेकिन साहित्य और रचनात्मक लेखन के प्रति उनका झुकाव उन्हें धीरे-धीरे लेखन की दुनिया में ले आया। इसके बाद उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानियों और व्यंग्य के जरिए हिन्दी साहित्य में अपनी खास पहचान बनाई।

सुरेंद्र वर्मा का पहला नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ 1972 में आया। इस नाटक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। नाटक में नारी कामुकता, लैंगिक समानता और मानवीय रिश्तों जैसे संवेदनशील विषयों को बेहद अलग नजरिए से सामने रखा गया।

सुरेंद्र वर्मा के लेखन की सबसे बड़ी खासियत उनके महिला पात्रों में दिखाई देती है। उन्होंने महिलाओं को सिर्फ कहानी का हिस्सा या किसी पुरुष किरदार के आसपास घूमने वाला चरित्र नहीं बनाया। उनके पात्र अपनी इच्छा, सवाल और फैसलों के साथ सामने आते हैं।

‘द्रौपदी’ में भी उन्होंने इसी तरह पौराणिक किरदार को आधुनिक संवेदनाओं के साथ देखने की कोशिश की। महाभारत की द्रौपदी भारतीय समाज में एक बेहद चर्चित पात्र हैं लेकिन सुरेंद्र वर्मा की नजर में वह सिर्फ पांच पतियों वाली महिला या युद्ध की वजह बनने वाली पात्र नहीं हैं। उनके लेखन में उसके भीतर के सवाल, भावनाएं और अपनी पहचान को लेकर संघर्ष भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सुरेंद्र वर्मा का नाटक ‘कैद-ए-हयात’ भी उनकी इसी रचनात्मक सोच का शानदार उदाहरण है। इसमें उन्होंने मशहूर शायर मिर्जा गालिब के जीवन को केंद्र में रखा। गालिब को आमतौर पर हम उनकी शायरी और शानदार अंदाज के लिए जानते हैं, लेकिन सुरेंद्र वर्मा ने उनके जीवन के व्यक्तिगत संघर्षों और चुनौतियों को भी संवेदनशीलता से सामने रखा।

नाटक के साथ-साथ उपन्यास के क्षेत्र में भी सुरेंद्र वर्मा ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनका चर्चित उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ 1993 में प्रकाशित हुआ और बाद में इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस रचना में आधुनिक समाज की जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से उकेरा गया है।

कालिदास, शकुंतला, चंद्रगुप्त और गालिब जैसे पात्रों को उन्होंने अपने लेखन में अलग नजर से देखा। उनके लिए इन किरदारों को दोबारा लिखना केवल अतीत को याद करना नहीं था बल्कि वर्तमान से उसका रिश्ता तलाशना था।

सुरेंद्र वर्मा ने करीब 15 पुस्तकों के जरिए हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और व्यास सम्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से उनका लंबा जुड़ाव रहा और उनके नाटकों को रंगमंच पर भी खूब पहचान मिली।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम