नई दिल्ली | 27 अगस्त (आईएएनएस)। राखी की डोर से भाईचारे का संदेश और हाथों में तिरंगा लेकर राष्ट्रीय एकता का संकल्प, दिल्ली में रक्षाबंधन पर आयोजित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) के कार्यक्रम ने इसी भावना को सामने रखा। डॉ. इंद्रेश कुमार का संदेश केवल किसी एक समुदाय या किसी एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जेन अल्फा, जेनजी से लेकर हर भारतीय के लिए प्रेम, सम्मान, भाईचारे, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का संदेश बना। ऐवान-ए-गालिब स्थित गालिब ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मुस्लिम बहनों ने डॉ. इंद्रेश कुमार की कलाई पर राखी बांधी और इसके बाद महिलाओं ने तिरंगा यात्रा में हिस्सा लेकर यह संदेश दिया कि अलग-अलग पहचान के बावजूद भारत की साझा पहचान सभी को एक सूत्र में जोड़ सकती है।
रक्षाबंधन के इस विशेष आयोजन में डॉ. इंद्रेश कुमार के साथ राष्ट्रीय संयोजकों की टीम, दिल्ली प्रदेश के संयोजक, सह-संयोजक, विभिन्न प्रकोष्ठों के संयोजक और सह-संयोजक तथा बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे। कार्यक्रम की खास बात इसकी विविध भागीदारी रही। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन समुदायों से जुड़े लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। प्रमुख रूप से मोहम्मद अफजल, गिरीश जुयाल, डॉ. शालिनी अली, हाफिज साबरीन, इमरान चौधरी, अनिल गर्ग, फैज खान, फैज अहमद फैज और शाकिर अली सहित अनेक लोग कार्यक्रम में शामिल रहे।
कार्यक्रम में राखी बांधने की परंपरा को एक व्यापक सामाजिक संदेश से जोड़ा गया। मुस्लिम बहनों द्वारा डॉ. इंद्रेश कुमार की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि विश्वास, स्नेह, सम्मान और भाईचारे का प्रतीक बनकर सामने आया। आयोजन का संदेश था कि इंसानी रिश्तों की गर्माहट को धर्म, जाति या सामाजिक पहचान की सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए। रक्षाबंधन के बहाने अलग-अलग समुदायों के लोगों का साथ आना इसी सोच को मजबूत करता दिखाई दिया कि भारत की विविधता के बीच आपसी सम्मान और संवाद सामाजिक एकता की मजबूत नींव बन सकते हैं।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. इंद्रेश कुमार ने शांति, सामाजिक सद्भाव, भाईचारे और ‘विविधता में एकता’ पर जोर दिया। उन्होंने लोगों से अपने मतभेदों से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करने और मिलकर ऐसे भारत के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया, जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं विभाजन का कारण न बनें, बल्कि देश की ताकत बनें। उनके संदेश में रक्षाबंधन को केवल पारिवारिक रिश्ते का त्योहार मानने के बजाय आपसी विश्वास और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखने की बात प्रमुख रही।
डॉ. इंद्रेश कुमार का यह संदेश आज की युवा पीढ़ी के संदर्भ में खास महत्व रखता है। जेन अल्फा और जेनजी ऐसी पीढ़ियां हैं जिनका जीवन डिजिटल दुनिया से गहराई से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया ने उन्हें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृतियों और विचारों से जोड़ दिया है। लेकिन इसी डिजिटल दुनिया में विचारों की कटुता, ट्रोलिंग, नफरत, गलत सूचनाओं और सामाजिक दूरी जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं। ऐसे समय में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि युवा तकनीक के जरिए कितनी तेजी से एक-दूसरे तक पहुंच रहे हैं, बल्कि यह भी है कि क्या वे इंसानी स्तर पर एक-दूसरे को समझने, सुनने और सम्मान देने के लिए भी उतनी ही तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। डॉ. इंद्रेश कुमार का संदेश इसी अंतर को पाटने की दिशा में प्रेम, संवाद और भाईचारे को महत्व देने की अपील करता है।
कार्यक्रम में डॉ. शालिनी अली ने महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, आत्मविश्वास और आर्थिक स्वतंत्रता को उनके मजबूत भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनका संदेश था कि महिलाओं की भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं है। जब महिलाएं शिक्षित, आत्मनिर्भर और अपने फैसले लेने में सक्षम होती हैं, तो इसका सकारात्मक असर परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक दिखाई देता है। उन्होंने महिलाओं से अपनी क्षमताओं को पहचानने, आत्मनिर्भर बनने और सामाजिक तथा राष्ट्रीय विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
रक्षाबंधन कार्यक्रम के बाद निकली तिरंगा यात्रा ने आयोजन के संदेश को एक और व्यापक आयाम दिया। महिलाओं ने हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर उत्साहपूर्वक यात्रा में हिस्सा लिया। तिरंगे के साथ आगे बढ़ती महिलाओं की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि राष्ट्र निर्माण किसी एक वर्ग, धर्म या समुदाय की जिम्मेदारी नहीं है। देश की प्रगति और एकता में महिलाओं की बराबर की भूमिका है और हर भारतीय की समान भागीदारी है।
तिरंगा यात्रा के जरिए यह संदेश भी सामने आया कि राष्ट्रीय ध्वज किसी एक धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र की पहचान नहीं है। तिरंगा हर भारतीय की साझा पहचान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। यही इस आयोजन की सबसे दिलचस्प कड़ी रही—एक ओर कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र था, जो विश्वास और भाईचारे की बात कर रहा था, तो दूसरी ओर हाथों में लहराता तिरंगा था, जो साझा भारतीय पहचान और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की याद दिला रहा था।
इस पूरे आयोजन में भारत की विविधता को कमजोरी के बजाय ताकत के रूप में देखने का प्रयास दिखाई दिया। भारत में त्योहार सदियों से केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम भी बने हैं। रक्षाबंधन भी इसी भावना को व्यापक रूप दे सकता है। जब अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग किसी त्योहार के अवसर पर साथ खड़े होते हैं, तो त्योहार की भावना परिवार की सीमाओं से निकलकर समाज तक पहुंचती है और एक-दूसरे के प्रति भरोसे को मजबूत करती है।
डॉ. इंद्रेश कुमार के संदेश का केंद्र इसी व्यापक विचार पर रहा, शांति हो, समाज में भाईचारा हो, महिलाओं को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें, विविधता का सम्मान हो और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना मजबूत हो। यह संदेश किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए है, विशेष रूप से युवाओं के लिए, जिनके हाथों में भारत का डिजिटल भविष्य भी है और आने वाले समय में देश की सामाजिक दिशा तय करने की क्षमता भी।
आज सोशल मीडिया के दौर में कोई संदेश कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जेनजी और जेन अल्फा के सामने चुनौती केवल नई तकनीक को तेजी से अपनाने की नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाता है, यह तय करने की भी है। वही डिजिटल प्लेटफॉर्म नफरत और विभाजन को बढ़ा सकता है और वही मंच संवाद, समझ, सहयोग और भाईचारे को भी मजबूत कर सकता है। किसी के खिलाफ नफरत फैलाना आसान हो सकता है, लेकिन अलग विचार रखने वाले व्यक्ति को सुनना और उसका सम्मान करना ज्यादा बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।
इस लिहाज से कार्यक्रम का संदेश केवल एक दिन के रक्षाबंधन समारोह तक सीमित नहीं दिखा। राखी के माध्यम से रिश्तों में विश्वास, महिलाओं की भागीदारी के माध्यम से सशक्तिकरण और तिरंगा यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता—इन तीनों को एक साथ जोड़कर आयोजन ने सामाजिक सद्भाव की एक व्यापक तस्वीर पेश की। इसमें रिश्ते भी थे, राष्ट्र भी, बहन का स्नेह भी था और तिरंगे का सम्मान भी।
कार्यक्रम का समापन शांति, सामाजिक सद्भाव, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय एकता के संकल्प के साथ हुआ। मुस्लिम बहनों द्वारा डॉ. इंद्रेश कुमार को बांधी गई राखी और महिलाओं की तिरंगा यात्रा ने मिलकर यह संदेश दिया कि भारत की अनेक पहचानें एक-दूसरे की विरोधी होने के बजाय एक साझा राष्ट्रीय पहचान के साथ आगे बढ़ सकती हैं।
आखिरकार इस आयोजन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और उसकी एकता आपसी सम्मान में। जेन एल्फा और जेनजी से लेकर हर उम्र और हर समुदाय के भारतीय के सामने यही चुनौती है कि डिजिटल दूरी के इस दौर में दिलों की दूरी न बढ़ने दी जाए। राखी की डोर विश्वास और भाईचारे को मजबूत करे और तिरंगा हर भारतीय को उसकी साझा जिम्मेदारी याद दिलाता रहे—अलग-अलग पहचान के साथ एक भारत, मजबूत भारत।
--आईएएनएस
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