नई दिल्ली, 1 सितंबर (आईएएनएस)। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े पर सियासत तेज हो गई है। जहां सत्तापक्ष इसे आर्थिक मजबूती बता रहा है, वहीं विपक्ष ने इन आंकड़ों को जमीनी हकीकत से दूर बताते हुए महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया है।
समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा, "यह जमीनी हकीकत से बहुत दूर है। आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था बहुत अस्थिर हालत में है। हमारी विदेश नीति और अर्थव्यवस्था अमेरिका पर निर्भर हो गई हैं। इसलिए, जमीनी हकीकत ऐसी रिपोर्टों में बताई गई बातों से बिल्कुल अलग है।"
सीपीआई के राज्यसभा सांसद पी. संतोष कुमार ने कहा, "इस तरह के आंकड़े तो हमेशा आते रहते हैं। असल सवाल यह है कि आम आदमी को इससे कितना फायदा हो रहा है? और सरकार इस सवाल पर चुप है। महंगाई चरम पर है, नीति आयोग के मुताबिक बेरोजगारी भी बढ़ रही है। ऐसे में इस तरह के बड़े-बड़े दावे करने का क्या मतलब है? ये दावे आम आदमी की जिंदगी में दिखने चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसलिए, ये सिर्फ बातें हैं। हो सकता है कि तकनीकी रूप से ये सही हों, लेकिन आम आदमी के लिए इनका कोई मतलब नहीं है।"
पंजाब कांग्रेस एससी विभाग के इंचार्ज सुधीर चौधरी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर निशाना साधते हुए कहा, "यह वित्त मंत्री से जुड़ा मामला है। जब महंगाई बढ़ रही थी। प्याज और लहसुन महंगे हो रहे थे। उन्होंने कहा था, 'मैं इन्हें नहीं खाती, तो मुझे क्या फर्क पड़ता है?' तो आज वह किस बारे में बात कर रही हैं? असल में क्या किया जाना चाहिए? आप ही बताइए। आप जीडीपी की बात करते हैं, लेकिन क्या महंगाई नहीं है? पेट्रोल और डीजल कितने महंगे हैं? चीनी और प्याज महंगे हो रहे हैं।"
आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने भी आंकड़ों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "यह 7.8 का आंकड़ा देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन क्या जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखता है? इन आंकड़ों के अनुसार, देश में महंगाई कम है, क्या प्याज, चीनी या पेट्रोल की कीमतों में यह दिखता है? क्या यह आंकड़ा जमीनी हकीकत से मेल खाता है, जबकि बेरोजगारी अपने चरम पर है? जब आरबीआई की रिपोर्ट कहती है कि हमारे देश में परिवारों की बचत पिछले पांच दशकों में सबसे कम है और उनकी अपनी रिपोर्ट से पता चलता है कि इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए बैंक क्रेडिट ग्रोथ को 18 प्रतिशत दिखाया गया, यानी लोग कर्ज लेकर अपना गुजारा कर रहे हैं। क्या यह सच्चाई इन आंकड़ों में दिखती है? क्या इससे यह पता चलता है कि आज भी देश के 80 करोड़ नागरिक सरकारी अनाज पर निर्भर हैं?"
--आईएएनएस
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