पटना, 31 अगस्त (आईएएनएस)। बिहार में दलित आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण के मुद्दे पर राजनीतिक घमासान सोमवार को और तेज हो गया। राजद सांसद मीसा भारती और भाजपा मंत्री लखेंद्र पासवान ने इस मुद्दे पर एनडीए नेताओं चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के रुख को लेकर सवाल उठाए।
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच चल रही बहस के बीच मीसा भारती ने उन नेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से लाभ मिला है, जबकि अब वे आरक्षण ढांचे में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
उन्होंने दोनों नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे आरक्षण व्यवस्था पर बहस करना चाहते हैं, तो पहले आरक्षित सीटों से इस्तीफा दें और सामान्य सीटों से चुनाव लड़कर दिखाएं। मीसा भारती ने यह भी आरोप लगाया कि एनडीए के सहयोगी दल राजनीतिक रूप से भाजपा पर निर्भर हो गए हैं और उसके निर्देशों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जदयू और उपेंद्र कुशवाहा भी इसी राह पर चल रहे हैं।
उनकी ये टिप्पणियां एनडीए के भीतर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आरक्षण के भविष्य को लेकर बढ़ते मतभेद के मद्देनजर आई हैं। जहां मांझी और उनके बेटे, बिहार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने उप-वर्गीकरण और "कोटा के भीतर कोटा" की वकालत की है, ताकि सबसे वंचित समुदायों को अधिक लाभ मिल सके। वहीं चिराग पासवान ने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का विरोध किया है और क्रीमी लेयर जैसे प्रस्तावों पर सवाल उठाए हैं।
इसी बीच, बिहार के मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता लखेंद्र पासवान ने भी इस मामले में दखल देते हुए चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों से तीखा सवाल पूछा।
उन्होंने कहा कि दलित और महादलित समुदायों के लिए काम करने का दावा करने वाले नेताओं को यह बताना चाहिए कि उनके प्रयासों से उनके परिवार से बाहर कितने लोगों को लाभ हुआ है। लखेंद्र पासवान ने आरक्षण पर भाजपा के रुख को दोहराते हुए कहा, "अगर भाजपा है, तो आरक्षण है।"
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार की सत्ताधारी एनडीए पार्टी के भीतर आरक्षण एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा है। गठबंधन सहयोगियों के बीच सार्वजनिक असहमति ने उप-वर्गीकरण, कोटा वितरण और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आरक्षण के व्यापक ढांचे को लेकर मतभेदों को और भी स्पष्ट कर दिया है।
सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष दोनों के नेताओं के अब इस मुद्दे पर अपनी राय देने के साथ, यह बहस बिहार में विशेष रूप से दलित और महादलित प्रतिनिधित्व के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है।
--आईएएनएस
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