नई दिल्ली, 29 अगस्त (आईएएनएस)। "सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहां चले। मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले।" एक ऐसी शख्सियत, जिनकी जिंदगी में ऐसे कई मोड़ थे, जब साहित्य, समाज और सिनेमा की गलियों से गुजरते नजर आए। बात हो रही है कि हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार, कथाकार, फिल्म पटकथा संवाद लेखक और एक जमाने के चर्चित कवि भगवती चरण वर्मा की।
भगवती चरण वर्मा के शब्दों में कहें तो उन्होंने अपने जीवन को धारावाहिक रूप में जीया। इसलिए उनके घटनापूर्ण जीवन को देखते हुए यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि एक धारावाहिक जिंदगी का नाम था भगवती चरण वर्मा। वे साहित्यकारों के बीच भगवती बाबू के नाम से प्रसिद्ध थे, जबकि परिजनों के लिए 'बाबूजी' थे।
30 अगस्त 1903 को उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में जन्मे भगवती बाबू उपन्यासकार, कथाकार और चिंतक के रूप में मशहूर हुए, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कविताएं लिखीं। उनके छह संग्रह प्रकाशित हुए। उनकी पहली कविता 'दैनिक प्रताप' में छपी थी, जब भगवती बाबू हाईस्कूल के छात्र थे।
'चित्रलेखा', 'पतन' और उसके बाद 'चाणक्य' बार-बार भगवती बाबू ने इतिहास को उकेरने और उसमें लौटने की कोशिश की। इसके बारे में भगवती चरण वर्मा ने एक इंटरव्यू में कहा था, "'चित्रलेखा' में रोमांस है और कल्पना है, जबकि 'चाणक्य' में कोई कल्पना नहीं। इसमें ऐसा कठोर और असल सत्य है, जिसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है।"
1943 में बॉम्बे टॉकीज की देविका रानी ने भगवती बाबू को बुलाया था। उनके बुलावे पर भगवती बाबू का वहां जाना हुआ और 1948 तक वहां रहे। इस दौरान, उन्होंने चार फिल्मों का न सिर्फ सेनेरियो लिखा, बल्कि उनके संवाद भी लिखे। उस जमाने में भगवती बाबू ने एक फिल्म भी प्रोड्यूस की थी।
भगवती चरण वर्मा को उनके एक मित्र ने बॉम्बे टॉकीज का एक निमंत्रण दिलवाया। वह ऐसा निमंत्रण था कि उसके जरिए वहां जाते ही नौकरी पक्की थी। बॉम्बे टॉकीज में आने-जाने का खर्चा भी मिला। इस निमंत्रण को लेकर वे वहां गए। उन्हीं दिनों कोलकाता में एक घटना हुई, जिससे पूरी स्थिति बिगड़ चुकी थी। इस कारण कोलकाता लौटने की बजाय भगवती चरण वर्मा मुंबई के निवासी हो गए। भगवती चरण वर्मा ने प्रसार भारती को दिए एक इंटरव्यू में इसका जिक्र किया था।
हालांकि, मुंबई में रहने के लिए काम की जरूरत रही। वह एक जगह पहुंचे और काम शुरू किया, जिसमें सफलता भी मिली। कहा जाता है कि भगवती चरण वर्मा वही शख्सियत थे, जिन्होंने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया था। वर्मा की पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' थी, जिसकी उन्होंने पटकथा लिखी थी। उसी फिल्म में नायक की भूमिका में दिलीप कुमार थे।
दिलचस्प है कि उन्हें खुद फिल्में तक लिखीं, लेकिन फिल्में देखने की रुचि उनकी कभी नहीं रही।
खैर, 1948 का समय आते-आते भगवती बाबू का फिल्मी दुनिया से मोहभंग हो चुका था। वे एक तरीके से उस चकाचौंध भरी नगरी से उखड़ चुके थे। वे बॉम्बे टॉकीज से हटकर वहीं से राजनीति में उतर आए। इरादा था कि बड़े नेता और मंत्री बनें। हालांकि, वे राज्यसभा के मानद सदस्य रहे, लेकिन तब मंत्री बनने की लालसा नहीं थी।
"जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण 'समर्पण' का दृष्टिकोण बन गया है। बहुत प्रयत्न किया, लेकिन जीवन की गतिविधि को और जीवन की सार्थकता को मैं नहीं समझ पाया। अपने चारों और सब कुछ अनजाना सा लगता है।"
भगवती बाबू की कहानियों को पढ़ते हुए मानो ऐसा लगता था कि जैसे वो उनकी खुद की जिंदगी की दास्तान हैं। 'भूले बिसरे चित्र', 'सीधी सच्ची बातें' और 'प्रश्न और मरीचिका' भगवती बाबू की तीन ऐसी कृतियां हैं, जिनमें उनके लेखन और चिंतन एक प्रतिनिधित्व दिया गया। उनमें उन्होंने महात्मा गांधी से पहले के समय, गांधी के समय, गांधी से नेहरू तक के दौर और बाद के काल को चित्रित किया।
--आईएएनएस
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