नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली बेंच ने इंस्टाग्राम पर पेड विज्ञापनों के जरिए बाल यौन शोषण सामग्री तक पहुंच की सुविधा देने के आरोपों पर संज्ञान लिया है। आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से दो हफ्ते के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) मांगी है।
यह मामला बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की मीडिया रिपोर्टों से सामने आया है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम पर 'रेप वीडियो' और 'चाइल्ड वीडियो' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके पेड विज्ञापन दिखाए गए थे। ये विज्ञापन यूजर्स को टेलीग्राम चैनलों पर ले जाते थे, जहां ऐसी सामग्री बिक्री के लिए पेश की जा रही थी। ये विज्ञापन मेटा के रिव्यू सिस्टम से पास हो गए और शिकायत तंत्र के जरिए रिपोर्ट किए जाने के बावजूद तब तक सुलभ रहे, जब तक बीबीसी ने इस मामले को विशेष रूप से मेटा के संज्ञान में नहीं लाया।
प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अगर आरोप साबित होते हैं, तो यह सिर्फ आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री का मामला नहीं होगा, बल्कि इसमें बच्चों का यौन शोषण, ऐसी सामग्री की रिकॉर्डिंग, प्रसार, प्रचार और मुद्रीकरण और संभावित संगठित आपराधिक गतिविधि शामिल हो सकती है।
आयोग ने पॉक्सो एक्ट 2012, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और लागू इंटरमीडियरी फ्रेमवर्क के तहत जांच पर जोर दिया है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का संरक्षण और फॉरेंसिक जांच, शामिल व्यक्तियों की पहचान, वित्तीय लेनदेन का पता लगाना और बाल पीड़ितों का बचाव, सुरक्षा और पुनर्वास शामिल है।
बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से पॉक्सो एक्ट 2012 की धारा 19 के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग के अनुपालन के बारे में विशेष रूप से जवाब मांगा है, जो अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान करती है। आयोग ने पूछा है कि क्या कथित अपराधों की जानकारी मिलने के बाद, मामले को स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट (एसजेपीयू) या स्थानीय पुलिस को रिपोर्ट किया गया था।
यदि मामला रिपोर्ट नहीं किया गया था, तो इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जिम्मेदार अधिकारी या प्राधिकरण की पहचान करने और रिपोर्ट करने में किसी भी विफलता के संबंध में की गई कार्रवाई को बताने के लिए कहा गया है।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरीश केस का भी संज्ञान लिया है, जिसमें तुरंत रिपोर्टिंग, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के संरक्षण, समन्वित जांच और बाल पीड़ितों की पहचान, बचाव और सुरक्षा पर जोर दिया गया था। आयोग ने आगे कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79, अपने आप में किसी संस्था को पॉक्सो अधिनियम के तहत उसके दायित्वों से मुक्त नहीं करती है।
इस मामले में एक महत्वपूर्ण नया मुद्दा मेटा की संपादकीय और प्रकाशक की भूमिका को लेकर है। एनएचआरसी के समक्ष रखी गई सामग्री में मेटा के सिस्टम के स्क्रीनशॉट शामिल हैं, जो शिकायतकर्ता के अनुसार कंटेंट आइडियाज, फॉर्मेट, स्लाइड सीक्वेंसिंग, कैप्शन, कॉल-टू-एक्शन, पोस्टिंग शेड्यूल, ऑडियंस एंगेजमेंट रणनीतियों और मुद्रीकरण के तरीकों से संबंधित सुझाव प्रदान करते हैं।
इस पृष्ठभूमि में, प्रियंक कानूनगो बेंच ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि जब किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के अपने सिस्टम सक्रिय रूप से कंटेंट को जेनरेट, मॉडिफाई, क्यूरेट, रिकमेंड, पब्लिश, एम्पलीफाई या मोनेटाइज करते हैं तो क्या उसकी कानूनी स्थिति को केवल एक निष्क्रिय इंटरमीडियरी के रूप में माना जा सकता है।
आयोग ने कहा है कि यह निर्धारण केवल प्लेटफॉर्म के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नाम पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि प्लेटफॉर्म द्वारा किए जाने वाले वास्तविक संपादकीय और प्रकाशन कार्यों और कंटेंट पर उसकी भागीदारी और नियंत्रण की डिग्री पर होना चाहिए। आयोग ने बच्चों और सीएसएएम/सीएसईएएम से जुड़े मामलों में कंटेंट क्यूरेशन, रिकमेंडेशन, टारगेटेड एम्प्लीफिकेशन और मोनेटाइजेशन से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को विशेष महत्व दिया है।
आयोग ने विशेष रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय से यह जांचने के लिए कहा है कि क्या, जहां मेटा के सिस्टम कंटेंट को जेनरेट, मॉडिफाई, क्यूरेट, रिकमेंड, पब्लिश या एम्प्लीफाई करते हैं, वहां मेटा आईटी नियम, 2021 के तहत पब्लिशर या ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट के पब्लिशर के रूप में एमआईबी के नियामक दायरे में आता है। एमआईबी से यह भी बताने के लिए कहा गया है कि यदि लागू हो तो मेटा की नियामक स्थिति और दायित्व क्या हैं और मौजूदा नियामक ढांचे के तहत मंत्रालय द्वारा क्या कार्रवाई की जानी है।
एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस द्वारा पहले प्रस्तुत की गई रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया है और दिल्ली के पुलिस आयुक्त को अतिरिक्त जानकारी प्रस्तुत करने के लिए दो सप्ताह का और समय दिया है। पुलिस से विशेष रूप से मामले में की गई कार्रवाई, टेलीग्राम से मांगी गई या प्राप्त की गई जानकारी और ऐसी जानकारी के आधार पर की गई परिणामी कार्रवाई का विवरण देने के लिए कहा गया है।
एनएचआरसी ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, एमआईबी और दिल्ली पुलिस के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर विशिष्ट और बिंदुवार रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जवाब सामान्य या घुमावदार प्रकृति के नहीं होने चाहिए और समकालीन रिकॉर्ड द्वारा समर्थित होने चाहिए।
--आईएएनएस
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