नई दिल्ली, 19 अगस्त (आईएएनएस)। 20 अगस्त… सिर्फ कैलेंडर में दर्ज एक तारीख नहीं बल्कि एक महान योग गुरु की पुण्यतिथि है, जिसने अपनी साधना से न सिर्फ खुद की जिंदगी बदली बल्कि पूरी दुनिया को योग के करीब ला दिया। जिस शख्स ने लाखों लोगों को शरीर और मन को मजबूत बनाने का रास्ता दिखाया, खुद उसका बचपन बीमारियों और कमजोरी से भरा हुआ था।
हम बात कर रहे हैं महान योग गुरु बेल्लूर कृष्णमाचार सुंदरराज अयंगर यानी बीकेएस अयंगर की, जिन्होंने 20 अगस्त 2014 को 95 साल की उम्र में पुणे में अंतिम सांस ली थी।
14 दिसंबर 1918 को कर्नाटक के बेल्लूर में एक साधारण परिवार में जन्मे अयंगर 13 भाई-बहनों में 11वें थे। परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। बचपन में ही उन्हें कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ा। मलेरिया, टाइफाइड, टीबी और कुपोषण जैसी परेशानियों ने उनके शरीर को बेहद कमजोर बना दिया था। खुद अयंगर ने अपने बचपन को याद करते हुए बताया था कि उनकी बाहें बेहद पतली, पैर कमजोर और पेट असामान्य रूप से निकला हुआ था।
अयंगर की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया, जब उनके बहनोई और योगगुरु तिरुमलाई कृष्णमाचार्य ने उन्हें योग सीखने के लिए मैसूर बुलाया। शुरुआत आसान नहीं थी। कृष्णमाचार्य बेहद कठिन आसनों का अभ्यास करवाते थे और अयंगर को कई बार काफी मुश्किल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता था।
हालांकि यही कठिन दौर आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। उन्होंने योग को सिर्फ शरीर को मोड़ने या अलग-अलग आसन करने की कला नहीं माना बल्कि इसे अनुशासन, एकाग्रता और शरीर की समझ से जोड़ दिया। 1937 में महज 18 साल की उम्र में उन्हें पुणे भेजा गया, जहां उन्होंने योग सिखाना शुरू किया।
धीरे-धीरे उनका अपना तरीका विकसित हुआ और आगे चलकर यही 'अयंगर योग' के नाम से दुनिया भर में पहचाना गया। इसमें शरीर के सही एलाइनमेंट और सही स्थिति पर खास जोर दिया जाता है। जरूरत के हिसाब से बेल्ट, ब्लॉक, कुर्सी और दूसरे प्रॉप्स का इस्तेमाल भी किया जाता है ताकि अलग-अलग उम्र और शारीरिक क्षमता वाले लोग योग का अभ्यास कर सकें।
अयंगर की अंतरराष्ट्रीय पहचान की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 1952 में उनकी मुलाकात मशहूर वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन से हुई। कहा जाता है कि मेनुहिन बेहद थके हुए थे और उन्होंने अयंगर से कहा कि उनके पास सिर्फ पांच मिनट हैं। अयंगर ने उन्हें शवासन में लेटने को कहा। मेनुहिन सो गए और करीब एक घंटे बाद जब उठे तो खुद को काफी तरोताजा महसूस कर रहे थे।
इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच गहरा संबंध बना। मेनुहिन ने अयंगर को स्विट्जरलैंड बुलाया और यहीं से उनके विदेश दौरों का सिलसिला शुरू हुआ। देखते ही देखते अयंगर का योग भारत से निकलकर यूरोप और अमेरिका तक पहुंचने लगा।
उनसे कई मशहूर लोगों ने योग सीखा। बेल्जियम की महारानी एलिजाबेथ ने भी उनसे योग का प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति, लेखक एल्डस हक्सले, अभिनेत्री एनेट बेनिंग, फिल्ममेकर मीरा नायर, डिजाइनर डोना करन और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जैसी हस्तियां भी उनके प्रशंसकों और शिष्यों में शामिल रहीं।
1966 में अयंगर की किताब 'लाइट ऑन योगा' प्रकाशित हुई। यह किताब इतनी लोकप्रिय हुई कि योग सीखने वालों के लिए एक तरह की संदर्भ पुस्तक बन गई। इसमें उन्होंने योग के आसनों को बेहद व्यवस्थित तरीके से समझाया। बाद में उनकी कई और किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें प्राणायाम और योग दर्शन से जुड़ी पुस्तकें भी शामिल थीं।
1975 में उन्होंने पुणे में अपनी दिवंगत पत्नी रामामणि की याद में रामामणि अयंगर मेमोरियल योग इंस्टीट्यूट की स्थापना की। पत्नी का निधन 1973 में हुआ था। दोनों ने मिलकर पांच बेटियों और एक बेटे का पालन-पोषण किया। उनकी बेटी गीता और बेटे प्रशांत ने भी योग की परंपरा को आगे बढ़ाया।
अयंगर को भारत सरकार ने 1991 में पद्मश्री, 2002 में पद्मभूषण और 2014 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 2004 में टाइम मैगजीन ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया।
--आईएएनएस
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