अच्छाई के रूप में आने वाली बुराई से लड़ना मुश्किल : पुलक सागर जी महाराज

अच्छाई के रूप में आने वाली बुराई से लड़ना मुश्किल : पुलक सागर जी महाराज

चित्तौड़गढ़, 9 जुलाई (आईएएनएस)। राष्ट्रीय संत और 'भारत गौरव' आचार्य 108 श्री पुलक सागर जी महाराज ने कहा कि जब तक देश ऋषियों और संतों के वचनों और ज्ञानवर्धक शिक्षाओं का पालन करता रहेगा, उसका भविष्य सुरक्षित रहेगा।

उन्होंने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जिस तरह का माहौल देश में बन रहा है, वो बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इससे ऐसा भी हो सकता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी धर्म से वंचित हो जाए। मैं यह दावा बिल्कुल भी नहीं करता कि मैं पूरी दुनिया को बदलकर रख दूंगा। मेरा काम सिर्फ आवाज लगाना है, कोई सुने या नहीं। मेरा कर्तव्य जागृत करना है। मैं पिछले 32 सालों से पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रहा हूं। मेरी कोशिश है कि मजबूत देश और समाज का निर्माण हो सके।

उनके मुताबिक, आज की तारीख में युवाओं के पास गति है। लेकिन, दिशा नहीं है। युवाओं को पता नहीं है कि उसे कहां पहुंचना है। मैं युवाओं से यही कहना चाहूंगा कि ज्यादा और जल्दी के चक्कर में न पड़ें, क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति जल्दबाजी करता है, तो दिशाहीन हो जाता है। हमें दुनिया में ज्यादा बटोरने पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि जब हम जाते हैं, तो खाली हाथ ही जाते हैं। जिन्होंने चित्तौड़गढ़ का किला बनाया, जिन्होंने इसे बनाने में अपना बलिदान दिया, वो चले गए, लेकिन किला आज भी मौजूद है। राम आए अयोध्या को लेकर नहीं गए, कृष्ण आए, लेकिन मथुरा को लेकर नहीं गए, तो हमारा मूल्य क्या है? इस धरा में हमारा सबकुछ धरा रह जाएगा। खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे। अगर युवा देश का ध्यान रखें, तो वो कभी नहीं भटकेंगे।

उन्होंने कहा कि बेईमानी की राह पर चलकर आपको सफलता तो मिल जाएगी। लेकिन, शांति नहीं मिलेगी। बेईमानी से आपको भोजन तो मिल जाएगा। लेकिन, भूख नहीं मिलेगी। बेईमानी से पानी मिल जाएगा, लेकिन प्यास ही नहीं लगेगी। ईमानदारी से अपना जीवन जीने की कोशिश करें। हमने बहुत सारे पैसे वालों के इतिहास पढ़े हैं। हमने राम का वनवास भी पढ़ा है। पैसों वाले के मंदिर नहीं बनते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि आज की तारीख में जो युवा सोशल मीडिया पर सभी लोगों से संवाद स्थापित कर रहा है, वो अपने परिवार और दोस्तों से ही कोई संवाद स्थापित नहीं करता है। मेरा ऐसे युवाओं से यही कहना है कि माता-पिता की कीमत को समझिए।

उन्होंने कहा कि मैं सोचता हूं कि अब लोगों को धर्म की बड़ी-बड़ी बातों की जगह इंसानियत का पाठ पढ़ाना चाहिए। हम अंतरिक्ष में पक्षी की तरह चले गए। हम मछलियों की तरह पानी में तैरना सीख गए। लेकिन, दुखी की बात है कि हम धरती पर चलना नहीं सीख पाए हैं। हमारा यही कहना है कि एक-दूसरे से जुड़कर रहें। हमने अपने लिए बहुत सारे मंदिर, मस्जिद बना लिए। लेकिन, हम लोग इंसान की तरह जीना नहीं सीख पाए। हम अपने जीवन को अर्थपूर्ण नहीं बना पाए। मैं खुद पूरे हिंदुस्तान की यात्रा करता हूं। मेरा यही सपना है कि इंसानियत की स्थापना हो।

उन्होंने कहा कि आज कल आस्था का माहौल भी बन रहा है। लोग तीर्थ भी कर रहे हैं। लेकिन, तीर्थ वो नहीं है कि लोग कांवड़ लेकर जा रहे हैं। तीर्थ में सुविधाएं बढ़ गई हैं। मंदिरों में भीड़ बढ़ गई है। लेकिन, ये भगवान के लिए नहीं, बल्कि इससे माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ ये लोग कहते हैं कि जैन मुनि को देख लो, त्याग करना सीख लो, लेकिन वहीं दूसरी तरफ इन लोगों के मुंह में मसाला भी होता है। बुराई जब बुराई के रूप में आती है, तो लड़ना आसान हो जाता है, लेकिन अच्छाई के रूप में आती है, तो लड़ना मुश्किल हो जाता है। रावण रावण के रूप में आता, तो सीता का हरण नहीं होता। लेकिन, रावण जब साधु का रूप धारण कर लेता है, तो सीता भी धोखा खाती है। जनता तो सीता बनी हुई है।

--आईएएनएस

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