नई दिल्ली, 21 जुलाई (आईएएनएस)। 22 जुलाई 1933 को गुजरात के लोथल में जन्मे हिम्मत शाह भारतीय आधुनिक मूर्तिकला और ड्राइंग के उन अग्रणी कलाकारों में रहे, जिनकी कला में इतिहास, स्मृति और मानव सभ्यता की गहरी छाप दिखाई देती है।
हिम्मत शाह ने सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के बीच बचपन बिताया, जिसने उनकी कलात्मक दृष्टि को गहराई से प्रभावित किया। कम उम्र में ही वे भावनगर चले गए और 'घरशाला' में पढ़ाई की। यह स्कूल 'दक्षिणमूर्ति' से जुड़ा था, जो गुजरात में राष्ट्रवादी पुनर्जागरण का बौद्धिक और सांस्कृतिक केंद्र था। 'घरशाला' में ही हिम्मत शाह ने कलाकार-शिक्षक जगुभाई शाह से कला की शुरुआती शिक्षा ली। यह सब बॉम्बे के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लेने और फिर 1956 से 1960 तक सरकारी सांस्कृतिक स्कॉलरशिप पर बड़ौदा जाने से पहले हुआ था।
बड़ौदा में एक युवा कलाकार के तौर पर हिम्मत शाह ने एनएस बेंद्रे से बहुत कुछ सीखा, जिनमें उन्हें एक आधुनिक कलाकार की छवि दिखी। साथ ही उन्होंने केजी सुब्रमण्यन से भी सीखा, जिनकी कला की भाषा की खोज और लोक कला की समझ ने उन्हें प्रेरित किया। ड्राइंग के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक और जरूरी था।
हिम्मत शाह 'ग्रुप 1890' के सदस्य थे, जो जे. स्वामीनाथन द्वारा बनाया गया कलाकारों का एक समूह था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1963 में इस समूह की पहली और एकमात्र प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। इसके कुछ ही समय बाद यह समूह बिखर गया और हिम्मत शाह समेत इसके सभी सदस्यों ने अपनी कला-यात्रा जारी रखी।
कवि और राजनयिक ऑक्टेवियो पाज की सिफारिश पर हिम्मत शाह को फ्रांसीसी सरकार की स्कॉलरशिप मिली। 1967 में वे पेरिस गए, जहां उन्होंने एसडब्ल्यू हेयटर और कृष्णा रेड्डी की देखरेख में 'एटेलियर 17' में एचिंग (नक्काशी) की पढ़ाई की।
हिम्मत अपनी मूर्तियों में प्रिंटमेकिंग की सतह के प्रभावों का इस्तेमाल करते थे, जिससे अलग-अलग मटीरियल को नए और प्रभावशाली ढंग से पेश करने की उनकी काबिलियत का पता चलता था। पेरिस में बिताए दो सालों के दौरान पढ़ाई करने और यूरोप के म्यूजियम्स की यात्रा करने से हिम्मत का अंतरराष्ट्रीय आधुनिकतावाद से जुड़ाव और मजबूत हुआ।
यूरोप से लौटने के बाद हिम्मत के शुरुआती कामों से उनके चुने हुए रास्ते का पता चलता है। इसमें टेराकोटा और स्टोनवेयर से बनी अलग-अलग खड़ी मूर्तियां शामिल थीं, जिनमें टोटेम जैसा एहसास था, आकृतियों का ऐसा समूह जो शायद किसी प्राचीन बस्ती के जीवन की झलक देता था।
1967 से 1971 के बीच, हिम्मत शाह ने अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स स्कूल में ईंट, सीमेंट और कंक्रीट से बड़े-बड़े भित्ति-चित्र (म्यूरल) डिजाइन किए और बनाए। इसके बाद, उन्होंने 'सिल्वर पेंटिंग्स' नाम की सीरीज़ में प्लास्टर पर रिलीफ (उभरी हुई नक्काशी) और जल्द ही टेराकोटा और ब्रॉन्ज (कांस्य) में मूर्तियां बनाना शुरू किया। वे दिल्ली चले गए और बाद में गढ़ी में एक स्टूडियो शुरू किया जो कलाकारों की प्रयोगशाला बन गया। यहां हिम्मत शाह टेराकोटा में एक अनोखी शैली विकसित करने के लिए मिट्टी और स्लिप (मिट्टी के घोल) के साथ प्रयोग करते थे।
2004-2005 में हिम्मत शाह ने अपनी ब्रॉन्ज की मूर्तियों पर काम किया और उन्हें लंदन की एक फाउंड्री में ढलवाया। टेराकोटा और ब्रॉन्ज में बनी उनकी 'हेड्स' (सिर की आकृतियां) उनके सबसे मशहूर काम हैं। शाह ने 2000 के दशक में जयपुर में अपना खुद का स्टूडियो शुरू किया। उनकी मूर्तियों को कई प्रतिष्ठित प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया गया है, जिनमें लौवर, रॉयल एकेडमी ऑफ आर्ट्स, बिएननेल डी पेरिस, म्यूजियम लुडविग, म्यूजियो डे ला नेसियन और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, दिल्ली शामिल हैं।
हिम्मत शाह को साहित्य कला परिषद पुरस्कार (1988), ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी पुरस्कार (1996) और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कालिदास सम्मान (2003) दिया गया। शाह का 2 मार्च 2025 को जयपुर में निधन हो गया था।
--आईएएनएस
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