तिरुवनंतपुरम, 4 अगस्त (आईएएनएस)। केरल ने एक स्वतंत्र आयुष विश्वविद्यालय स्थापित करने की दिशा में एक अहम औपचारिक कदम उठाया है। यह कदम आगामी दिनों में शैक्षणिक गतिविधियों को नई गति प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे शोध और नवाचार जैसे क्षेत्रों में भी लोगों का उत्साह बढ़ेगा।
स्वास्थ्य एवं देवस्वोम मंत्री के. मुरलीधरन ने मंगलवार को ऐलान किया कि चार सदस्यीय समिति का गठन किया जाएगा, जो प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के संबंध में मसौदा प्रस्तुत कर सके। इस पैनल से केरल आयुष यूनिवर्सिटी के संबंध में दो महीने के भीतर मसौदा प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
यह प्रस्तावित यूनिवर्सिटी सभी आयुष शैक्षणिक संस्थानों को एक छत के तले लाने में अहम साबित होंगे, जो मौजूदा समय में केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस से सबद्ध हैं।
इसकी परिकल्पना आयुर्वेद, होम्योपैथी, सिद्धा, यूनानी और अन्य मान्यता प्राप्त आयुष स्ट्रीम में शैक्षणिक कार्यक्रमों, नैदानिक प्रशिक्षण, अनुसंधान, औषधि विकास और नीतिगत पहलों के समन्वय के लिए एक विशेष संस्थान के रूप में की गई है।
मंत्री ने इसे केरल के परंपरागत स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। मंत्री ने कहा कि यह यूनिवर्सिटी एकीकृत शैक्षणिक तंत्र तैयार करेगा, जो शिक्षण और शोध के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय जरूरतों की पूर्ति करने की दिशा में अहम साबित होंगे।
विश्वविद्यालय का मुख्यालय त्रिपुनिथुरा स्थित आयुर्वेद के मूलभूत अनुसंधान विद्यालय में स्थापित किया जाएगा।
कानून बनाने के अलावा, समिति अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करने से पहले शासन संरचना, शैक्षणिक ढांचा, अनुसंधान प्राथमिकताएं और प्रशासनिक प्रणालियों की जांच करेगी। इस समिति की अध्यक्षता आयुष विभाग के प्रधान सचिव करेंगे और राष्ट्रीय आयुष मिशन के राज्य मिशन निदेशक संयोजक के रूप में कार्य करेंगे।
आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा के निदेशक और सरकारी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के प्रधानाध्यापक और नियंत्रक अधिकारी अन्य सदस्य हैं।
विश्वविद्यालय से अंतर्विषयक अनुसंधान को मजबूत करने, आयुष शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने और नैदानिक अध्ययन और औषधीय नवाचार के अवसरों का विस्तार करने की उम्मीद है।
केरल को पहले से ही आयुर्वेद के एक प्रमुख केंद्र के रूप में माना जाता है। प्रस्तावित विश्वविद्यालय से राज्य की पारंपरिक चिकित्सा के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ भारत की स्वदेशी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर अधिक पहचान मिलने की उम्मीद है।
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