मुंबई, 1 सितंबर (आईएएनएस)। पवन कल्याण सिर्फ तेलुगु सिनेमा का ही बड़ा नाम नहीं हैं, बल्कि राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। पर्दे पर उनकी एंट्री एक ऐसे कलाकार के तौर पर हुई थी, जिसे शुरुआत में कैमरे के सामने आने का खास शौक नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि पवन कल्याण खुद एक्टर बनने के बजाय पर्दे के पीछे काम करना चाहते थे।
उन्हें लिखने, डायरेक्शन और फिल्म की तकनीकी चीजों में दिलचस्पी थी, लेकिन परिवार के प्रोत्साहन ने उनकी राह बदल दी। उनकी भाभी सुरेखा और भाई चिरंजीवी की सलाह के बाद उन्होंने एक्टिंग को मौका दिया और आगे चलकर वही पवन कल्याण तेलुगु सिनेमा के 'पावर स्टार' कहलाए।
पवन कल्याण का जन्म 2 सितंबर 1971 को आंध्र प्रदेश के बापटला में हुआ था। उनका असली नाम कोनिडेला कल्याण बाबू है। वह अभिनेता चिरंजीवी और अभिनेता-निर्माता नागेंद्र बाबू के छोटे भाई हैं।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह तकनीकी काम सीखना चाहते थे और खास तौर पर डायरेक्शन में उनकी दिलचस्पी थी। उन्हें लिखना, कहानी को पर्दे पर उतारना और फिल्म बनाने की प्रक्रिया आकर्षित करती थी।
फिल्मों में आने के लिए पवन को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन उनकी भाभी सुरेखा से मिला। सुरेखा, चिरंजीवी की पत्नी हैं। पवन ने खुद बताया है कि उनकी भाभी और अल्लू अरविंद की मां कनका रत्नम ने उन्हें एक्टिंग की तरफ आने के लिए प्रेरित किया। बाद में उन्होंने कहा कि फिल्मों में उनका आना एक तरह से उनकी भाभी की वजह से हुआ। उन्होंने अभिनेता बनने का हौसला दिया।
पवन कल्याण ने साल 1996 में फिल्म 'अक्कड़ा अम्मायी इक्कड़ा अब्बायी' से एक्टिंग डेब्यू किया। शुरुआत में उन्हें चिरंजीवी के छोटे भाई के तौर पर देखा गया, लेकिन उन्होंने जल्द ही अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी। इसके बाद 'गोकुलमलो सीता', 'सुस्वागतम' और 'थोली प्रेमा' जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया। 1998 में आई 'थोली प्रेमा' उनके करियर की खास फिल्मों में शामिल हुई। इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन तेलुगु मिला।
इसके बाद पवन कल्याण ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'थम्मुडु', 'बद्री' और 'कुशी' जैसी फिल्मों ने उनकी फैन फॉलोइंग को और बड़ा कर दिया। खासकर 'कुशी' ने उन्हें युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। उनकी हेयरस्टाइल, कपड़े, एक्शन और स्क्रीन पर बोलने का अंदाज तक फैंस के बीच पसंद किया जाने लगा, लेकिन पवन के मन में डायरेक्शन का सपना अभी भी था। साल 2003 में उन्होंने 'जॉनी' बनाई। इस फिल्म में वह खुद लीड रोल में थे और उन्होंने इसे लिखा और डायरेक्ट भी किया।
पवन के करियर में कुछ मुश्किल दौर भी आए। 'जॉनी' के बाद 'गुडुंबा शंकर', 'बालू', 'बंगारम' और 'अन्नवरम' जैसी फिल्मों का प्रदर्शन उनकी पिछली बड़ी फिल्मों जैसा नहीं रहा। इसके बाद 2008 में 'जलसा' ने उन्हें फिर बड़ी सफलता दिलाई। 2012 में आई 'गब्बर सिंह' ने उनके करियर को एक बार फिर नई ऊंचाई दी। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर-तेलुगु मिला। इसके बाद 'अत्तरिन्तिकी दारेदी', 'गोपाला गोपाला', 'वकील साब' और 'भीमला नायक' जैसी फिल्मों ने उन्हें पावर स्टार बना दिया।
सिनेमा के बाद पवन ने राजनीति में भी कदम रखा। उन्होंने 2014 में जन सेना पार्टी की स्थापना की और बाद में सक्रिय राजनीति में पूरी तरह उतर गए। वर्तमान में वह आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं।
--आईएएनएस
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