नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। भारत में एनर्जी स्टोरेज की आवश्यकता वित्त वर्ष 32 तक लगभग 8 गुना बढ़कर करीब 411 गीगावाट घंटे होने की उम्मीद है, जबकि जून 2026 तक ऑपरेशनल स्टोरेज क्षमता लगभग 54 गीगावाट घंटे थी। यह दावा मंगलवार को आई एक रिपोर्ट में किया गया।
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, टारगेटेड स्टोरेज क्षमता के लिए 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश की जरूरत होगी, जो अगले छह सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का बड़ा मौका देगा।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि एनर्जी स्टोरेज एक अहम भूमिका निभा रहा है। यह दिन के समय अतिरिक्त सोलर बिजली को स्टोर करता है और शाम के पीक घंटों में सप्लाई करता है, जिससे नेट लोड कर्व को संतुलित करने, बिजली कटौती को कम करने और रैम्पिंग की जरूरतों को आसान बनाने में मदद मिलती है।
कंपनी ने कहा कि भारत का पावर सेक्टर क्षमता बढ़ाने की चुनौती से आगे बढ़कर इंटीग्रेशन (ग्रिड में जोड़ने) की चुनौती की ओर बढ़ रहा है।
गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी इंस्टॉल्ड क्षमता में 50 प्रतिशत थी, लेकिन बिजली उत्पादन में इनका योगदान केवल 29 प्रतिशत के आसपास रहा, जो रिन्यूएबल स्रोतों की अनियमितता और कम पीएलएफ (प्लांट लोड फैक्टर) को दिखाता है।
इसमें बताया गया है कि सोलर एनर्जी के बढ़ते इस्तेमाल से 'डक कर्व' गहरा होता जा रहा है। सुबह के समय रैम्प-डाउन (बिजली की मांग में कमी) मई 2025 में लगभग 28 गीगावाट से बढ़कर मई 2026 में लगभग 50 गीगावाट हो गया, जबकि शाम के समय रैम्प-अप (दिन के सबसे कम नेट लोड से बढ़ोतरी) लगभग 68 गीगावाट से बढ़कर लगभग 80 गीगावाट हो गया।
यह ट्रेंड पारंपरिक बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा रहा है और आरई (रिन्यूएबल एनर्जी) की कटौती में योगदान दे रहा है। ट्रांसमिशन और ग्रिड-स्टेबिलिटी की चिंताओं के कारण 3एमएफवाई27 में लगभग 8.1 टीडब्ल्यूएच सोलर बिजली की कटौती की गई।
केयरएज रेटिंग्स के ईडी और सीआरओ सचिन गुप्ता ने कहा, "भारत का पावर सेक्टर रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने की चुनौती से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करने की ओर बढ़ रहा है कि रिन्यूएबल बिजली को ग्रिड में प्रभावी ढंग से जोड़ा जा सके। जैसे-जैसे सोलर और विंड क्षमता बढ़ेगी, अतिरिक्त ऊर्जा को स्टोर करने और पीक डिमांड के समय उसका इस्तेमाल करने की क्षमता अहम हो जाएगी।"
टेंडरिंग की गतिविधि में भी तेजी आ रही है। वित्त वर्ष 25 में 7 गीगावाट के मुकाबले वित्त वर्ष 26 में लगभग 21 गीगावाट के स्टैंडअलोन-स्टोरेज आधारित टेंडर जारी किए गए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) और पंपेड स्टोरेज प्लांट (पीएसपी) दोनों ही एक-दूसरे के पूरक के तौर पर काम करेंगे।
बीईएसएस में मॉड्यूलरिटी, ज्यादा दक्षता और कम समय में तैयार होने की खूबी है, जबकि पीएसपी लंबे समय तक स्टोरेज, एसेट की लंबी उम्र और आयात पर कम निर्भरता की सुविधा देते हैं।
रेटिंग एजेंसी ने दोनों तकनीकों से स्टोरेज की लागत लगभग 4.5-5 रुपए प्रति यूनिट आंकी है, जिसमें इनपुट बिजली की लागत शामिल नहीं है, लेकिन साइकिल लॉस को ध्यान में रखा गया है।
--आईएएनएस
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