'टाटा संस का मॉडल बचाना होगा': टाटा ट्रस्ट्स ने आईपीओ का किया विरोध, की अन्य विकल्पों पर विचार की मांग

टाटा समूह के भीतर टाटा संस लिस्टिंग को लेकर विवाद
टाटा संस का मॉडल बचाना होगा

नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक टाटा समूह के भीतर टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। समूह की सबसे बड़ी शेयरधारक संस्था टाटा ट्रस्ट्स ने गुरुवार को स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल टाटा संस के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने (आईपीओ) के पक्ष में नहीं है और इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले सभी संभावित विकल्पों का आकलन किया जाना चाहिए।

एक महत्वपूर्ण बोर्ड बैठक के बाद जारी बयान में टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि उसने टाटा संस की लिस्टिंग पर सहमति नहीं दी है। ट्रस्ट्स ने यह भी बताया कि इस विषय पर अलग से एक बोर्ड बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें आईपीओ के विकल्पों का मूल्यांकन किया जाएगा और आगे की रणनीति तय की जाएगी।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब 11 सितंबर को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने टाटा संस की उस याचिका को स्वीकार नहीं किया, जिसमें कंपनी ने अपनी अपर लेयर एनबीएफसी श्रेणी से स्वैच्छिक रूप से बाहर निकलने की अनुमति मांगी थी।

इस फैसले के बाद यह माना जा रहा है कि नियामकीय आवश्यकताओं के चलते टाटा संस को भविष्य में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना पड़ सकता है। हालांकि टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि आरबीआई के पत्र में कहीं भी सीधे तौर पर लिस्टिंग का निर्देश नहीं दिया गया है और अभी भी अन्य विकल्पों पर विचार की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने बोर्ड को भेजे गए अपने विस्तृत नोट में कहा कि टाटा संस ने अपनी गैर-सूचीबद्ध स्थिति बनाए रखने और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) नियमों का पालन करने के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इस राशि का उपयोग प्रेफरेंस शेयरों को समय से पहले रिडीम करने और कर्ज चुकाने में किया गया।

उन्होंने कहा, "कोई कंपनी केवल ढांचे को बचाने के लिए 20,000 करोड़ रुपए खर्च नहीं करती, बल्कि वह अपने मूल चरित्र और उद्देश्य को बचाने के लिए ऐसा करती है।"

नोएल टाटा ने चेतावनी दी कि यदि टाटा संस सूचीबद्ध हो जाती है तो उसे संस्थागत निवेशकों के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा, जिनका मुख्य उद्देश्य वित्तीय रिटर्न हासिल करना होता है।

उन्होंने कहा कि इस स्थिति में समूह के लिए उन परियोजनाओं में निवेश करना कठिन हो सकता है, जिनका लाभ लंबी अवधि में मिलता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि संकटग्रस्त समूह कंपनियों को सहायता देना या सेमीकंडक्टर और नागर विमानन जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक निवेश करना सार्वजनिक शेयरधारकों को स्वीकार नहीं हो सकता।

उनके अनुसार, टाटा समूह की विशेषता यह रही है कि वह केवल व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसले ले सकता है। लिस्टिंग इस मूल दर्शन को प्रभावित कर सकती है।

नोएल टाटा ने कहा कि मार्च 2024 में दिवंगत रतन टाटा के मार्गदर्शन में टाटा संस के बोर्ड ने सर्वसम्मति से कंपनी को गैर-सूचीबद्ध बनाए रखने का निर्णय लिया था।

इसके बाद जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी अलग-अलग प्रस्ताव पारित कर कंपनी को निजी स्वरूप में बनाए रखने का समर्थन किया था।

उनका कहना है कि यह केवल वर्तमान प्रबंधन का विचार नहीं है, बल्कि लंबे समय से समूह की रणनीतिक सोच का हिस्सा रहा है।

नोएल टाटा ने कहा कि यदि अंततः लिस्टिंग से बचना संभव नहीं होता, तो कंपनी को आरबीआई से कम से कम तीन वर्ष का अतिरिक्त समय मांगना चाहिए। उन्होंने कहा कि हालिया आरबीआई पत्र से समयसीमा की गणना करते हुए लिस्टिंग की अंतिम तिथि सितंबर 2029 तक बढ़ाई जा सकती है।

उन्होंने तर्क दिया कि टाटा संस जैसी विशाल होल्डिंग कंपनी के लिए वित्तीय विवरणों का समेकन, आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में बदलाव और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं बेहद जटिल हैं। इसके अलावा एयर इंडिया और टाटा डिजिटल के मौजूदा वित्तीय प्रदर्शन को देखते हुए जल्दबाजी में आईपीओ लाना निवेशकों और कंपनी, दोनों के लिए उचित नहीं होगा।

नोएल टाटा ने अपने बयान में स्पष्ट संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यदि मौजूदा परिस्थितियों में लिस्टिंग के प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है, तो उनके पास उसे वीटो करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

--आईएएनएस

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