नई दिल्ली, 3 अगस्त (आईएएनएस)। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने बैंकों को बल्क डिपॉजिट की कीमत तय करते समय 'लिक्विडिटी कवरेज रेश्यो' (एलसीआर) रन-ऑफ रेट्स पर विचार करने की इजाजत दी है। इससे बैंकों को तरलता लागत के हिसाब से जमा दर तय करने में ज्यादा लचीलापन मिलेगा।
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से बैंकों की फंडिंग लागत भी बेहतर होगी और एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट में सुधार होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कदम से डिपॉजिट के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकता है और अलग-अलग बैंकों के बीच फंडिंग लगात में अंतर बढ़ सकता है।
जिन बैंकों का जमा आधार कमजोर है, उन्हें अधिक फंडिंग लागत का सामना करना पड़ सकता है, जबकि मजबूत करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट वाले बैंकों को फायदा हो सकता है। साथ ही, पारदर्शिता बढ़ाने के लिए इस फ्रेमवर्क में डिस्क्लोजर से जुड़ी शर्तें भी सख्त की गई हैं।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि नए तरीके से बैंक तरलता की विशेषताओं और लागू होने वाले 'रन-ऑफ रेट' के आधार पर बल्क डिपॉजिट की अलग-अलग कीमत तय कर सकते हैं। इसके लिए बैंकों को मुश्किल समय में कैश की संभावित निकासी को पूरा करने के लिए पर्याप्त 'हाई-क्वालिटी लिक्विड एसेट्स' (एचक्यूएलए) रखने की जरूरत होती है।
उन्हें एक जैसी डिपॉजिट कैटेगरी के लिए बिना भेदभाव वाली कीमत तय करने के नियम का पालन करना होगा।
फर्म ने बताया कि अलग-अलग तरह की डिपॉजिट और बिना गारंटी वाली होलसेल फंडिंग के 'रन-ऑफ रेट' अलग-अलग होते हैं, इसलिए बैंक अब डिपॉजिट की कीमत तय करते समय उनसे जुड़ी तरलता लागत को भी ध्यान में रख सकते हैं।
पहले, प्राइसिंग फ्रेमवर्क में डिपॉजिट की लिक्विडिटी विशेषताओं के आधार पर दरों में अंतर करने की गुंजाइश सीमित थी।
आरबीआई ने डिपॉजिट पर ब्याज दरों के बारे में संशोधित निर्देश और संशोधन आदेश जारी किए हैं, जो 1 अक्टूबर, 2026 से लागू होंगे। इनके तहत सभी ब्रांच में एक जैसी दरें रखना अनिवार्य है, लेकिन लिक्विडिटी रिस्क के आधार पर बल्क डिपॉजिट के लिए प्राइसिंग में छूट दी गई है।
असल में दिया जाने वाला ब्याज, बैंक की वेबसाइट पर पहले से बताए गए शेड्यूल के अनुसार ही होना चाहिए।
बैंकों को हर कामकाजी दिन सुबह 10:00 बजे तक अपनी वेबसाइट पर बल्क डिपॉजिट के लिए तय ब्याज दरें भी पब्लिश करनी होंगी और उन्हें 10 मिनट का ग्रेस पीरियड दिया जाएगा।
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