नई दिल्ली: लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला और उन पर महिलाओं के हितों के खिलाफ खड़े होने का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट में लिखा कि अब कल ‘पीडीए’ प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी। इसमें महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन बिल की भाजपाई साजिश का खुलासा होगा।
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पोस्ट में लिखा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने 29 मिनट के भाषण में कांग्रेस का नाम 58 बार लिया यानी हर मिनट में दो बार। इसी से पता चलता है कि वे कितने घबराए हुए हैं, क्योंकि उनकी विभाजनकारी और अलोकतांत्रिक डेलिमिटेशन की साजिश को विपक्ष ने हरा दिया।
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि यही है भाजपा का असली चेहरा है। पटेल समाज से आने वाले सांसद नरेश उत्तम के घर पर जूता चप्पल चलाया जा रहा है। ओबीसी नेताओं को अपमानित करना भाजपा की मानसिकता का हिस्सा है।
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पोस्ट में लिखा कि महिलाओं के लिए आरक्षण का बिल 2023 में ही पास हो गया था और 2 दिन पहले ही इसे नोटिफाई भी कर दिया गया है। अब इसे लागू करने और 543 सीटों में से 1/3 सीटें महिलाओं को देने से आपको कोई भी चीज नहीं रोक सकती—ठीक वैसे ही, जैसा कि टीएमसी ने किया है।
टीएमसी सांसद साकेत गोखले ने एक्स पर पोस्ट में लिखा कि अगर ज्ञानेश कुमार में सचमुच हिम्मत है तो उन्हें आज रात पीएम मोदी के टीवी भाषण का खर्च भाजपा के चुनावी खर्च के खाते में जोड़ना चाहिए।
उन्होंने आगे लिखा कि एक और बात, जो नेता आत्मविश्वास से भरा होता है, वह इतना बेताब होकर बर्ताव नहीं करता। 2 राज्यों के चुनावों के बीच आज रात पीएम मोदी की यह कमजोर कोशिश दिखाती है कि वह घबराए हुए हैं। यह दयनीय कोशिश पीएम मोदी-गृह मंत्री अमित शाह के आने वाले पतन का एक और संकेत है। वे दोनों अपनी पकड़ खो रहे हैं और यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है। उल्टी गिनती बंगाल से शुरू होती है।
टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने एक्स में पोस्ट में लिखा कि पीएम नरेंद्र मोदी, महिलाओं का अपमान करने का सबसे बुरा तरीका यह है कि आपने परिसीमन विधेयक को पारित करवाने की कोशिश में उन्हें एक 'डिकॉय' के तौर पर इस्तेमाल किया।
डिकॉय (संज्ञा): कोई ऐसी चीज या व्यक्ति, जिसका इस्तेमाल किसी को झांसा देकर वह काम करवाने के लिए किया जाता है, जो आप उनसे करवाना चाहते हैं।
केरल से राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री ने कभी भी राष्ट्र के नाम अपने संबोधन का इस्तेमाल इस तरह से खुले तौर पर विपक्ष की आलोचना करने और उसे निशाना बनाने के लिए नहीं किया है। पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन से इस लंबे समय से चले आ रहे लोकतांत्रिक नियम को तोड़ दिया है। महिला आरक्षण बिल को लेकर विपक्ष पर सीधे हमला करके और उनके कार्यों की तुलना 'भ्रूण हत्या' और 'महिला-विरोधी' होने से करके, यह साफ कर दिया है कि भाजपा स्वस्थ संसदीय परंपराओं और संवैधानिक रीति-रिवाजों को कमजोर करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। यह साफ है कि कल लोकसभा में मिली करारी हार के बाद सरकार अपना संतुलन खो चुकी है। अब समय आ गया है कि इस तरह की बयानबाजी बंद हो। सरकार को महिला आरक्षण के तेजी से लागू होने के मुद्दे को सुलझाने के लिए पूरी ईमानदारी से आगे आना चाहिए और लोकतांत्रिक-संघीय भारत के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए।
राज्यसभा सांसद कमल हासन ने एक्स पोस्ट में लिखा कि परिसीमन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक के ऐतिहासिक रूप से गिर जाने के बाद, डीएमके ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए एक 'निजी सदस्य विधेयक' पेश किया है, जिसमें इसे परिसीमन से नहीं जोड़ा गया है।
उन्होंने आगे कहा कि यह विधेयक परिसीमन पर लगी रोक को 2051 तक बढ़ाने का भी प्रस्ताव करता है, जिससे राज्यों को जनसंख्या स्थिरीकरण हासिल करने के लिए समय मिल सके। हमारे उत्तर भारतीय राज्य महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण—यानी महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के समान अवसर उपलब्ध कराकर—इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।
यदि हम महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर सचमुच गंभीर हैं तो संसद की मौजूदा सदस्य संख्या के भीतर ही 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
कमल हासन ने पोस्ट में आगे लिखा कि उत्तर भारतीय राज्यों और शेष भारत के बीच मौजूदा क्षेत्रीय जनसंख्या असमानताओं के चलते, 'चोर दरवाजे' से परिसीमन लाने का कोई भी प्रयास भारत के संघीय संतुलन को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है।
तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे राज्यों को—जिन्होंने महिला-केंद्रित विकास और जनसंख्या स्थिरीकरण को प्राथमिकता दी है—एक 'आदर्श' के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मैं केंद्र सरकार से आग्रह करता हूं कि विधानसभा चुनावों के बाद संसद का एक और विशेष सत्र बुलाया जाए और इस विधेयक को पारित किया जाए, अथवा बिना किसी विलंब के इसके समकक्ष कोई सरकारी कानून पेश किया जाए।
--आईएएनएस
