Maihar Devi Temple : मैहर देवी मंदिर में नवमी की धूम, दिखा मां शारदा का मनमोहक रूप

मैहर देवी मंदिर में नवमी पर भक्तों ने की कन्या पूजन और विशेष पूजा-अर्चना।
मैहर देवी मंदिर में नवमी की धूम, दिखा मां शारदा का मनमोहक रूप

मैहर: चैत्र नवरात्रि की नवमी पूरे उत्साह और भक्ति के साथ पूरे देश में उत्साह के साथ मनाई जा रही है। शुक्रवार सुबह से ही मध्यप्रदेश के मैहर देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी लंबी लाइनें लगी हुई हैं। हर कोई माता के दर्शन करने के लिए उतावला नजर आ रहा है।

शुक्रवार सुबह ब्रह्म मुहूर्त में माता के पट खुले और त्रिकूट पर्वत 'जय माता दी' के जयकारों से गूंज उठा। चारों तरफ भक्ति और आस्था का माहौल छा गया, जिसे देखकर नवरात्रि का नवां दिन और भी भक्तिमय नजर आ रहा था।

पवित्र बेला में मां शारदा का खास श्रृंगार किया गया। देवी को सुंदर वस्त्र, फूलों की मालाएं और आभूषण पहनाकर सजाया गया। माता का यह शृंगार दाऊ महाराज द्वारा ही किया जाता है। उन्होंने विधि-विधान से माता रानी की आरती उतारी। आरती के समय भक्तों की अपार भीड़ देखने को मिली। वहीं, पूरा मंदिर परिसर जय माता दी के जयकारों से गूंज उठा। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

नवमी के अवसर पर भक्तों ने कन्या पूजन, हवन और विशेष पूजा-अर्चना कर मां का आशीर्वाद प्राप्त किया। इससे उन्होंने मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त किया। दूर-दूर से आए श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर पहुंचने लगे थे। कई लोग लंबी कतारों में घंटों खड़े रहे, फिर भी उनके चेहरे पर प्रसन्नता और भक्ति झलक रही थी।

प्रशासन ने दर्शन की अच्छी व्यवस्था की थी। भक्तों को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े, इसके लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीमें लगातार तैनात रहीं। पानी, छाया और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। इससे भक्त शांति से दर्शन कर सके।

मैहर देवी मंदिर में नवमी के दिन जो दृश्य देखने को मिला, वह वाकई अनुपम था। भक्तों का उत्साह और मंदिर की दिव्यता हर किसी को आकर्षित कर रही थी।

मंदिर को लेकर कई पौराणिक कहानियां हैं। कहा जाता है कि जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को ले जा रहे थे, तब यहां माता का गले का हार गिरा था, जिससे इसका नाम 'मैहर' (माई + हर = मां का हार) पड़ा। वहीं, वीर आल्हा और ऊदल (पृथ्वीराज चौहान के समकालीन) ने इस मंदिर की खोज की थी। आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक तपस्या की थी, जिससे उन्हें अमरता का वरदान मिला। आज भी मान्यता है कि आल्हा रोज सुबह 4 बजे सबसे पहले माता की पूजा करते हैं।

--आईएएनएस

 

 

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