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नई दिल्ली, 30 मार्च (आईएएनएस)। लोकसभा को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने के प्रयासों पर चल रही चर्चा के दौरान संबोधित किया। लोकसभा में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई पर बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "नक्सलवादी तिलका मांझी को अपना आदर्श नहीं मानते थे। न ही वे भगवान बिरसा मुंडा, भगत सिंह या सुभाष बाबू को अपना आदर्श मानते थे। तो, फिर वे किसे अपना आदर्श मानते हैं? माओ को। यहां तक कि अपने आदर्शों के चयन में भी वे विदेशों से आयातित विचारों का सहारा लेते हैं।"
अमित शाह ने कहा कि हम एक लोकतंत्र में रहते हैं। हमने इस देश के संविधान को अपनाया है... यह ऐसी सरकार नहीं है जो किसी की धमकियों के आगे झुक जाए। यह सरकार सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि 1969 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), या सीपीआई (मार्क्सवादी), की स्थापना हुई। इसका प्राथमिक उद्देश्य न तो राष्ट्र का विकास था और न ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। इसके बजाय, पार्टी का संवैधानिक लक्ष्य चीन और रूस के उदाहरणों का अनुसरण करते हुए सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से संसदीय प्रणाली को उखाड़ फेंकना था। हालांकि, उन देशों के विपरीत, भारत में राजतंत्र नहीं था, बल्कि यहां लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार थी।
लोक सभा में नियम 193 के तहत वामपंथी उग्रवाद के खात्मे से जुड़ी चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री ने कहा कि 1947 से पहले इस देश के ट्राइबल्स बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, और मुर्मु बंधुओं को अपना आदर्श मानते थे। वहीं, आदिवासी 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो मानने लगे। ये परिवर्तन क्यों हुआ?
उन्होंने कहा कि ये परिवर्तन विकास की कमी या अन्याय के कारण नहीं हुआ। कठिन भूगोल और स्टेट की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने इसी क्षेत्र को चुना, भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाया। नक्सलवाद गरीबी के कारण नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इन पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही। नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं है, वो वैचारिक है।
उन्होंने कहा कि हम लोकतंत्र में हैं, हमने इस देश के संविधान को स्वीकार किया है। अन्याय किसी के साथ भी हो सकता है, विकास कहीं पर भी कम ज्यादा हो सकता है। मैं पूछना चाहता हूं कि आप अपनी लड़ाई संवैधानिक तरीकों से लड़ेंगे या हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों को मार डालेंगे। किस थ्योरी का यहां से समर्थन हो रहा था। अगर आप धमकाना चाहते हैं कि ये होगा तो ये भी हथियार उठाएंगे, वो होगा तो वो भी हथियार उठाएंगे। लेकिन कान खोलकर सुन लीजिए... ये डरने वाली सरकार नहीं है, सभी के साथ न्याय करने वाली सरकार है।
उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी, बंगाल से हुई। 1971 के एक ही वर्ष में 3620 हिंसा की घटनाएं वहां पर हुईं। 1980 का दशक आते-आते पीपल्स वार ग्रुप बन गया। और फिर ये महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा... ये तीन राज्यों में फैले। 1970 से 2004... इस पूरे कालखंड में 4 साल छोड़कर पूरा समय कांग्रेस पार्टी का शासनकाल रहा है... ये उनको याद रखना चाहिए।
--आईएएनएस
एमएस/एबीएम