कर्नाटक सरकार ने छात्रों के लिए जिम्मेदार डिजिटल उपयोग नीति जारी की, अत्यधिक स्क्रीन टाइम पर लगाम लगाने का फैसला

बेंगलुरु, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। कर्नाटक सरकार ने बुधवार को एक मसौदा नीति की घोषणा की, जिसका उद्देश्य छात्रों के बीच जिम्मेदार डिजिटल उपयोग को बढ़ावा देना है। यह नीति अत्यधिक स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर बढ़ती चिंताओं को दूर करने पर केंद्रित है।

स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव ने कहा, "स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (एनआईएमएचएएनएस) (बेंगलुरु में) और अन्य संबंधित विभागों के सहयोग से 'छात्रों के बीच जिम्मेदार डिजिटल उपयोग' नीति तैयार की है। इसका उद्देश्य स्कूली बच्चों के बीच डिजिटल तकनीक के असुरक्षित और अत्यधिक उपयोग से पैदा होने वाली समस्याओं से निपटना है।"

मसौदे के अनुसार, लगभग हर चार में से एक किशोर में इंटरनेट के समस्याग्रस्त उपयोग के लक्षण दिखाई देते हैं। यह नीति बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं जैसे कि चिंता, नींद में गड़बड़ी, खराब शैक्षणिक प्रदर्शन और अत्यधिक स्क्रीन के संपर्क में रहने से जुड़े सामाजिक अलगाव को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि यह साइबरबुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग और डिजिटल शोषण के बढ़ते जोखिमों पर भी प्रकाश डालती है।

उन्होंने बताया, "इस नीति का मुख्य उद्देश्य एक व्यवस्थित, स्कूल-आधारित ढांचे के माध्यम से डिजिटल भलाई, भावनात्मक लचीलापन और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी उपयोग को बढ़ावा देना है। यह एक निवारक दृष्टिकोण का प्रस्ताव करती है जो डिजिटल लत और संबंधित मुद्दों की शीघ्र पहचान और प्रबंधन पर केंद्रित है।"

इस नीति के तहत, डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और साइबर सुरक्षा को स्कूली व्यवस्था में एकीकृत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि प्रभावी कार्यान्वयन के लिए स्कूलों, शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों और सरकारी एजेंसियों को शामिल करते हुए एक बहु-हितधारक मॉडल का प्रस्ताव किया गया है।

गुंडू राव ने कहा कि मुख्य निर्देशों में, राज्य सरकार स्कूलों के लिए दिशानिर्देश पेश करने, स्वस्थ प्रौद्योगिकी उपयोग पर शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने और छात्रों की डिजिटल आदतों के संबंध में अभिभावकों के साथ संचार को मजबूत करने की योजना बना रही है।

नीति के प्रमुख हस्तक्षेपों में डिजिटल भलाई को जीवन कौशल और आईसीटी शिक्षा में एकीकृत करना शामिल है, जिसमें सोशल मीडिया साक्षरता, साइबर सुरक्षा, नैतिक प्रौद्योगिकी उपयोग और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों को शामिल किया गया है।

उन्होंने कहा कि स्कूलों को अपनी स्वयं की डिजिटल उपयोग नीतियां तैयार करना भी आवश्यक होगा, जिसमें मनोरंजन के लिए प्रतिदिन एक घंटे तक की अनुशंसित स्क्रीन-टाइम सीमाएं शामिल होंगी, साथ ही साइबर कदाचार से निपटने और परामर्श सहायता प्रदान करने के लिए तंत्र भी शामिल होंगे।

मसौदा नीति व्यवहारिक और शैक्षणिक 'रेड फ्लैग' (खतरे के संकेतों) की जल्द पहचान पर भी जोर देती है, जिसमें प्रशिक्षित शिक्षक जरूरत पड़ने पर छात्रों को परामर्शदाताओं और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के पास भेजेंगे। कार्यान्वयन, जागरूकता कार्यक्रमों और घटना प्रबंधन की देखरेख के लिए स्कूल-स्तरीय डिजिटल भलाई समितियां गठित की जाएंगी।

संतुलित विकास को बढ़ावा देने के लिए, यह नीति शारीरिक व्यायाम, शौक और निर्धारित 'टेक-फ्री' (तकनीक-मुक्त) अवधियों जैसी ऑफलाइन गतिविधियों को प्रोत्साहित करती है। डिजिटल संकट को ट्रैक करने और टीईएलई-एमएएनएएस सहित सहायता सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए निगरानी प्रणालियां स्थापित की जाएंगी।

शिक्षकों को टेक्नोलॉजी की लत को पहचानने और उससे निपटने के कौशल से लैस करने के लिए एक व्यवस्थित 'ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स' मॉडल शुरू किया जाएगा। इसमें व्यवहारिक पैटर्न को समझना भी शामिल होगा, जैसे कि किसी चीज की तीव्र इच्छा, नियंत्रण खो देना, मजबूरी, सामना करने के तरीके और इसके परिणाम।

यह नीति माता-पिता की भूमिका को भी मुख्य हितधारकों के रूप में रेखांकित करती है, और उनसे आग्रह करती है कि वे स्क्रीन-टाइम के नियमों को सख्ती से लागू करें, घर पर 'डिवाइस-मुक्त क्षेत्र' बनाएं, और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दें। स्कूल नियमित जागरूकता और मार्गदर्शन सत्रों के माध्यम से माता-पिता का सहयोग करेंगे।

--आईएएनएस

एससीएच

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