देहरादून (दैनिक हाक): विश्व भारत की अगुवाई में जलवायु परिवर्तन – महामारी जैसी ही एक समस्या जिससे हम गुजर रहे हैं और जो किसी सीमा, धन एवं कोई अन्य मानवीय विभाजन से बंधा नहीं है - के खिलाफ लड़ाई के लिए तैयार है। नेतृत्व की इस भूमिका को निभाने की क्षमता से हमें लैस करने की जिम्मेदारी हमारे वैज्ञानिक जगत से जुड़ी महिलाओं और पुरुषों के कंधों पर है। यह बात केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज देहरादून में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान में वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कही।

 

केन्द्रीय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान; राज्यमंत्री प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, अणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर यह एक सुखद संयोग है कि मैं एक ऐसे संस्थान में हूं जो पर्यावरण की रक्षा के प्रति वचनबद्ध एक आधुनिक एवं नए भारत का प्रतिनिधित्व करता है और ऊर्जा के वैकल्पिक स्वदेशी स्रोत की खोज में संलग्न है।


 

केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि पिछले आठ वर्ष जलवायु परिवर्तन के खिलाफ भारत की लड़ाई के गवाह रहे हैं। हमने 2030 पेरिस समझौते के लक्ष्य से काफी आगे जाकर, नवीकरणीय स्रोतों से 40 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पहले ही पूरा कर लिया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विश्व के अन्य नेताओं को इसका अनुसरण करने का संकेत किया है। उन्होंने कहा कि सौर एवं पनबिजली स्रोतों से नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देने के अलावा, प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में लंबी छलांग की घोषणा की। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण के लिए लड़ने के हमारे सामूहिक इरादे का रोडमैप तैयार करता है।

 

एक पूर्व शोधकर्ता के रूप में बोलते हुए, केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि हमें सबूतों को ध्यान में रखकर बोलना चाहिए। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि सीएसआईआर-आईआईपी द्वारा खाना पकाने के अपशिष्ट तेल से बायो-डीजल बनाने की परियोजना सीएसआईआर प्रयोगशाला के कई ऐसे उदाहरणों में से एक है जो हमारे राष्ट्रीय इरादे को प्रदर्शित करती है। केन्द्रीय मंत्री ने वैज्ञानिक समुदाय से इसे एक जन आंदोलन बनाने की दिशा में काम करने का आग्रह किया। डॉ. सिंह ने कहा कि हमें लोगों को यह समझाना चाहिए कि खाना पकाने के जिस बेकार तेल को वे नियमित रूप से फेंक देते हैं, उससे उन्हें 30 रुपये प्रति लीटर की कमाई हो सकती है।

 

केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि अब हमें यह पता है कि हम ऊर्जा की अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा कार्बन फेंक देते हैं। इस कचरे के उपयोग के अभिनव तरीके ‘आत्मनिर्भर भारत’ और मेक-इन-इंडिया के दोहरे लक्ष्यों को पूरा करेंगे। जनता में पैदा हुई जिज्ञासा जागरूकता को बढ़ावा देगी और इससे विज्ञान के अनुप्रयोग तथा जीवन को आसान बनाने में मदद मिलेगी।

 

केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि लंबे समय के बाद राजनीतिक नेतृत्व और वैज्ञानिक समुदाय मिलकर काम कर रहे हैं। सरकार अपने सभी कार्यों में वैज्ञानिक प्राथमिकताओं द्वारा निर्देशित होती है। उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं को शिक्षा एवं उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि वे सम्मान सुरक्षित करने की लड़ाई में आम लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकें।

 

केन्द्रीय मंत्री ने वैज्ञानिकों से सरकारी एजेंसियों और निजी संस्थाओं में अपने हितधारकों के साथ मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार में तालमेल बनाने के लिए अंतर-मंत्रालयी बैठकें आयोजित करने की परिपाटी बन गई है। डॉ. सिंह ने कहा कि आण्विक ऊर्जा क्षेत्र इस तरह के सहयोग का एक प्रमुख उदाहरण है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि भारत अब स्टार्ट-अप से जुड़े इकोसिस्टम का केंद्र बन गया है। हालांकि, उन्होंने इस बात के लिए आगाह किया कि हमें आईटी-सक्षम सेवाओं तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमें एग्रोटेक के क्षेत्र में उपलब्ध अप्रयुक्त अवसरों का खुलकर दोहन करना चाहिए।

 डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह स्पष्ट है कि दुनिया तिहरी चुनौती का सामना कर रही है: पृथ्वी अपेक्षा से अधिक तेजी से गर्म हो रही है, हम आवास एवं प्रजातियों की विविधता खो रहे हैं; और प्रदूषण निरंतर जारी है। उन्होंने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की कि अब जबकि हम आज से 25 वर्ष बाद अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाने की ओर बढ़ रहे हैं, तो हमें किफायती स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन की दिशा में काम करना चाहिए।   






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