हर्षवर्धन पाण्डे*


नैनीताल (दैनिक हाक): उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात भारतीय जनता पार्टी ने विभिन्न नेताओं को उत्तराखंड की बागडोर सौंपी, परन्तु जनता के बीच कोई चेहरा लोकप्रिय नहीं हो सका। ऐसे समय में राज्य की भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए एक व्यक्ति ने देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है वो नाम है युवा तुर्क पुष्कर सिंह धामी।  खटीमा सीट से इस बार विधान सभा चुनाव हारने के बाद जिस तरह की सधी रणनीति ने इस बार मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी ने चम्पावत सीट से प्रचंड मतों से चुनाव जीता है उसने साबित किया है उत्तराखंड की राजनीती में क्यों उन्हें भविष्य का पुष्कर कहा जाने लगा है । इस जीत ने ये भी साबित किया है मार्च में हुए विधानसभा चुनावों में उनको उनकी पार्टी के नेताओं और कुछ नौकरशाहों ने जिस तरह उनकी हार का षड़यंत्र रचा, हार की पटकथा लिखी  चम्पावत की जनता ने उनको इस बार आईना इस प्रचंड जीत के माध्यम से दिखा दिया। अब चम्पावत का रण प्रचंड जीत से फतह करने के बाद ऐसे  भीतरघातियों पर कार्यवाही होनी तय है।

उत्तराखण्ड गठन के बाद पहली बार जब 2002 में चंपावत सीट पर कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल विधायक बने थे, जबकि दूसरे नंबर पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले मदन महराना रहे। 2002 के इस चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर पर रही । इसके बाद 2007 में भाजपा के टिकट पर वीना महाराजा विधायक बनी । 2012 के चुनाव में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल दोबारा से विधायक बने थे। 2017 में कैलाश चंद्र गहतोड़ी भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए। 2022 में पार्टी ने एक बार फिर कैलाश गहतोड़ी पर दांव लगाया तो वह जीत दर्ज करने में सफल रहे। चंपावत सीट को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। गत विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा के कैलाश गहतोड़ी ने कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल को 5304 वोटों से हराया था। इस चुनाव में कैलाश गहतोड़ी को 32547 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल 27243 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे जबकि खर्कवाल को 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 19000 वोट मिले थे जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चंपावत उप चुनाव में रिकार्ड मतों से जीत दर्ज की है। उन्होंने कांग्रेस की निर्मला गहतोड़ी को 55025 मतों से पराजित किया। मुख्यमंत्री धामी के प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और अन्य प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाये। चंपावत की जनता ने कांग्रेस उम्मीदवार को बुरी तरह नकार दिया। उन्हें 3233 मत मिले। कांग्रेस की राज्य में अब तक की यह सबसे बुरी हार है। बीते 31 मई को हुए चंपावत उप चुनाव में डाक पत्रों समेत कुल 62898 मत पड़े। शुक्रवार को हुई मतगणना के अनुसार पुष्कर सिंह धामी को कुल 58258, कांग्रेस प्रत्याशी को 3233, समाजवादी समर्थित मनोज कुमार भट्ट को 413 तथा निर्दलीय हिमांशु गडकोटी को 402 और नोटा को 377 मत पड़े। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पहले राउंड में ही अपनी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की निर्मला गहतोड़ी पर बढ़त कायम कर ली थी। पहले राउंड में कांग्रेस को मात्र 164 तो धामी को 3856 मत हासिल हुए। अंतिम 13वें राउंड तक धामी अपनी बढ़त को मजबूत करते चले गए। डाक मत पत्रों में भी कांग्रेस भाजपा से पीछे रही और यहां धामी को 990 तो कांग्रेस को मात्र 86 मत हासिल हुए। इसी प्रकार समाजवादी समर्थित उम्मीदवार को पोस्टल बेलेट के माध्यम से केवल चार मत मिले। धामी की जीत से भाजपा में खुशी की लहर है। उल्लेखनीय है कि खटीमा से विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को चंपावत से होने वाले उप चुनाव के लिये प्रत्याशी घोषित किया था। चंपावत के निवर्तमान विधायक कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने उनके लिये सीट खाली की थी। धामी खटीमा से कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी से सात हजार से अधिक मतों से विधानसभा चुनाव हार गए थे।

भाजपा की सियासत में युवा मोर्चा के दो बार प्रदेश अध्यक्ष , एक बार उपाध्यक्ष और दो बार भाजपा का विधायक होना और फिर सीएम रहना इतना आसान नहीं है । फिर बिना मंत्री रहते हुए सीधे कई दिग्गजों की फौज को पीछे छोड़ते हुए सीधे मुख्यमंत्री का ताज ग्रहण कर हार के बाद भी मुख्यमंत्री बन जाना ये आज की राजनीति में दुर्लभ हैं लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने अपनी क्षमताओं से इतने काम समय में यह सब हासिल किया है । एक दौर में खाँटी जनसंघी रहे महामहिम भगत सिंह कोश्यारी के इस मृदुभाषी चेले ने फिर से ये साबित कर डाला है कि खटीमा सीट हार जाने के बाद भी उनको कमजोर नेता समझना विरोधियों की भारी भूल है । पुष्कर सिंह धामी ने चम्पावत सीट पर ऐतिहासिक विजय से  मिशन 2024 की मुनादी अभी से कर दी है । पुष्कर धामी अभी काफी युवा हैं और उनमें पार्टी को आगे बढ़ाने की पूरी क्षमताएँ अभी मौजूद हैं। खटीमा सीट हारने के बाद भी जिस अंदाज में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व धामी के साथ खड़ा रहा उसने भाजपा के तमाम दिग्गजों को भी ये साफ संदेश दिया है है कि नेतृत्व के पास अपना आकलन करने का एक अलग सा तरीका है।

पुष्कर सिंह धामी के लिए राजनीति का मतलब इस दौर में जनसेवा और हर संकट का समाधान खोजना है । उनका हंसमुख , सरलता और सौम्यता से भरा व्यक्तित्व हर आम इंसान को अपनी तरफ खींच लेता है। विचारों में आधुनिक, किंतु भारतीयता की जड़ों से गहरे जुड़े पुष्कर सिंह धामी संघ परिवार के उन सामान्य समर्पित कार्यकर्ताओं में से एक हैं , जिनमें गहरा भारत बोध बचपन से भरा हुआ है । दो बार युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सहजता से निभाने वाले धामी देखते ही देखते राजनीति के मैदान में रम गए । उत्तराखंड के ,जल,जीवन और जंगल के साथ ही युवाओं के रोजगार के सवाल भी किसी राजनेता की जिंदगी जीने की वजह हैं तो उसका दूसरा नाम है पुष्कर सिंह धामी । पुष्कर धामी के रुतबे और उनकी कार्यशैली को समझने के लिए हमें यह जानना जरूरी है वो किस तरह अपने काम को शालीनता के साथ अंजाम तक पहुंचाते हैं । इस बात से सभी वाकिफ हैं उत्तराखंड में भाजयुमो में रहते उन्होंने राज्य में तत्कालीन काँग्रेस सरकार के सामने युवाओं के बेरोजगारी के सवाल को सड़क से लेकर विधान सभा के गेट तक उठाने में सफलता पाई जिसके बाद 2010-11 में काँग्रेस सरकार को राज्य में लगने वाले उद्योगों में 70 फीसदी आरक्षण देने को मजबूर होना पड़ा था। सही मायनों में कहा जाये तो नाउम्मीद को उम्मीद में बदलना पुष्कर सिंह धामी की बड़ी कला है। उनकी इस कला का लोहा विपक्षी दल के नेता भी मानते हैं। चम्पावत से जीत के बाद  पुष्कर सिंह धामी को लेकर देहरादून से लेकर हड़खोला गाँव तक जश्न है तो इसका कारण उनका युवाओं के बीच समर्पण और जनता के सरोकारों से जुड़ा हुआ नेता होना है ।

जिद, जिजीविषा, जीवटता का त्रिकोण एक साथ किसी एक व्यक्ति में देखना हो तो आपको पुष्कर धामी की जनसेवा की साधना को एक बार समझना चाहिए। एक ऐसा नायक जिसने एक सामान्य से परिवार में पहाड़ की बेहद खुरदरी जमीन से जिंदगी की धीमी शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा वर्ग करने के बाद उनके भीतर समाजसेवा का जनज्वार उमड़ने लगा और इसी राष्ट्रभक्ति के संस्कारों के बूते वो आसमान की उस ऊंचाई तक आज सीएम के रूप में पहुंचे हैं , जहां पहुंचना किसी के लिए सपने से कम नहीं है। राज्य भाजपा के पास पुष्कर सिंह धामी जैसा व्यक्ति एक आम कार्यकर्ता का प्रतीक भी हैं। बहुत पुरानी बात नहीं है कि जब वे विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के नाते इस परिवार में आए और भारतीय जनता युवा मोर्चा में अपनी लगातार मेहनत, श्रेष्ठ संवाद शैली और संगठन कौशल से सूबे के मुख्यमंत्री का पद भी कम उम्र में प्राप्त किया। वह भी उस दौर में जब चुनाव सर पर खड़े थे । काफी कम समय में भाजपा के सामने बहतर प्रदर्शन करने की चुनौतियां खड़ी थी । भाजपा त्रिवेन्द्र सिंह रावत के रहते चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं थी तो तीरथ रावत भी बेहद कम समय मिलने के चलते आम जन का विश्वास जीतने में सफल नहीं हो पाए । लेकिन धामी के युवा जोश ने पहली बार भाजपा को न केवल एकजुट किया बल्कि निचले कार्यकर्ता को भी ये अहसास कराया वह राज्य के मुख्य सेवक की भूमिका में हर पल को राज्य और पार्टी के हित में लगायेंगे । अपनी भाव-भंगिमाओं,प्रस्तुति और वाणी से उन्होनें सभी को ये अहसास कराने में सफलता हासिल की , वे आज भी दल के एक अदने से कार्यकर्ता ही हैं। कार्यकर्ता भाव जीवित रहने के कारण वे राज्य के युवाओं में भी काफी लोकप्रिय हैं और जनता के बीच नागरिक भाव जगाने के प्रयासों में लगे हैं। वे जनमर्म को बखूबी समझते हैं शायद यही वजह है शपथ ग्रहण करने से ठीक पहले पी एम मोदी के मंत्र सबका साथ और सबका विश्वास को उन्होनें अपना मूल मंत्र बताया ।

पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के उन चुनिंदा राजनेताओं में से हैं जिनके व्यक्तित्व में एक गुरूत्वाकर्षण मौजूद है। युवा उन्हें देखना , सुनते रहना चाहते हैं। वे युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को उठाते हैं और युवाओं के बीच काम करने के कारण आयकन के रूप में जाने जाते हैं । आप एक बार उनसे मिल लें तो उनकी विलक्षण प्रतिभा और संगठानिक क्षमताओं का मुरीद हुए बिना नहीं रह सकते । हमेशा वे अपनी मनमोहिनी मुस्कान और संगठन के लिए सारी ताकत और सारे संपर्कों को झोंक देना का जोश लिए पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में युवा मोर्चे के हर आन्दोलन में युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाते नजर आते हैं । पूरे राज्य में युवाओं का एक समूचा तंत्र केवल पुष्कर सिंह धामी के पास है जिनके एक आह्वान पर युवाओं की भारी भीड़ एकत्रित हो जाती है । वे संगठन और विचार की राजनीति को बखूबी समझते हैं। पहाड़ की ऊबड़ खाबड़ जमीन से आने के नाते, जमीनी कार्यकर्ता की भावनाओं को पढ़ना उन्हें आता है। आपको अगर काम के प्रति लगन , समर्पण और हमेशा सकारात्मकता का भाव आज के किसी युवा राजनेता में देखना हो तो वो पुष्कर सिंह धामी से बेहतर कोई नहीं हो सकता। वो राज्य ऐसे इकलौते राजनेता हैं जिसने पहाड़ की पगडंडियों से जिन्दगी की शुरुवात की और बेहद कम समय में युवाओं के बीच लोकप्रिय हुए हैं । अविभाजित यू पी और उत्तराखंड में पार्टी के सच्चे सिपाही के तौर पर उन्होंने खुद को अपने काम के बूते हर जगह साबित किया है वहीं खटीमा सरीखे मैदानी क्षेत्र से विधायक होने के बाद भी वे कुमाऊँ व गढ़वाल दोनों मंडलों में युवाओं के बीच समान आधार रखते रहे हैं । इन सबके बीच पुष्कर सिंह धामी सबसे बेपरवाह रहते हुए शालीनता के साथ संघ के देश प्रथम, संगठन द्वितीय और व्यक्ति अंतिम के सिद्धांत को दोहराकर अपने मिशन में जुट जाते हैं।

जब महाराष्ट्र के महामहिम भगत सिंह कोश्यारी अन्तरिम भाजपा सरकार में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे उस समय पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री कार्यालय को बखूबी संभाला और अपनी प्रशासनिक दक्षता से सराहनीय कार्य कर भगत सिंह कोश्यारी को अपना राजनीतिक गुरु बना लिया और उनके बताए रास्ते पर राजनीति की राह का हर सफर पूरा किया । इसके अलावा तत्कालीन सीएम बी सी खण्डूडी और रमेश पोखरियाल निशंक सरकारों में भी सरकारी दायित्वधारी रहकर अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े। शहरी विकास अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में शहरी विकास की योजनाओं के जरिए कायाकल्प किया । उत्तराखंड में आज की बदली परिस्थितियों के बीच ये चर्चा आम हो चुकी है कि पुष्कर सिंह धामी ही अब उत्तराखंड भाजपा का भविष्य हैं शायद यही वजह है अब भाजपा पुष्कर सिंह धामी के आसरे अपनी तीसरी पीढ़ी के नेताओं के भरोसे उत्तराखंड के भविष्य के लिए युवाओं पर दांव खेलने को बेकरार दिखाई देती है । पुष्कर सिंह धामी को बीते बरस से कुछ महीने पहले कमान देकर आलाकमान ने जो संदेश दिया है आज उसे डिकोड किए जाने की जरूरत है । इस बार पार्टी ने अनुभव से ज्यादा काबिलियत को तरजीह दी जिसमें पुष्कर सिंह धामी पूरी तरह से फिट बैठते हैं । पिछले कुछ समय से प्रदेश भाजपा में काँग्रेस से आयातित नेताओं की संख्या बढ़ी है जिनका एक मात्र उद्देश्य किसी तरह सत्ता की मलाई खाते रहना और बगावत का झण्डा बुलंद करना है । इन सभी की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता कुछ चीज नहीं रही । ऐसे सभी नेताओं से कन्नी काटते हुए भाजपा आलाकमान ने  पुष्कर सिंह धामी के रूप में नया दांव खेला है जो पार्टी का आम कार्यकर्ता है । इसमें कोई दो राय नहीं पुष्कर आज उत्तराखंड के युवाओं की आन, बान और शान हैं। वो उत्तराखंड के इकलौते युवा नेता हैं जिनका पूरे उत्तराखंड के हर कोने में युवाओं के बीच व्यापक जनाधार है। उनके चाहने वाले युवा आपको यमकेश्वर से लेकर धरमपुर , रायवाला से लेकर बदरीनाथ , माणा से लेकर धारचूला के पांगला और खिर्सू से लेकर जौनसार और नेपाल के महेन्द्रनगर तक मिल जाएँगे । उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ को पुष्कर धामी के सीएम बनने के बाद प्रदेश की सियासत में एक मजबूत पहचान मिली है । उनका अब तक का राजनीतिक सफ़र उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी को बखूबी बयां करता है।

पुष्कर सिंह धामी जहां एक ओर संघ के बहुत करीबी हैं वहीं वे बचपन से संघ की शाखाओं में विभिन्न प्रकल्पों के भी भागीदार रहे हैं। इसके अलावा अविभाजित उत्तरप्रदेश में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में उनकी सक्रियता उनको अन्य नेताओं से अलग करती है । उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में जन्म लेने के बाद भी उन्होनें खटीमा जैसे मैदानी इलाकों को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना और दो बार विधायक बनकर अपने काम के बूते वहाँ की जनता का दिल जीतने का काम किया है । 2012 के चुनावों से पहले एक दौर में खटीमा को काँग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने अपनी बिसात से काँग्रेस को हर तरफ से चारों खाने चित्त कर दिया है । पुष्कर सिंह धामी को पिछली विधान सभा में बेहतर विधायक के सम्मान से उनके कामों के बूते नवाजा जा चुका है । उन्हें राजनीति विरासत में नहीं मिली है और न ही उनके परिवार की राजनीति में में कोई पृष्ठभूमि रही है । फिर भी धामी ने अपनी मेहनत, जोश और जज्बे से उत्तराखंड की राजनीति में खुद को स्थापित किया है । एक खास बात जो उनको उत्तराखंड के अन्य नेताओं से अलग करती है वो है उनकी सादगी, ईमानदारी और दामन पर किसी तरह का कोई दाग नहीं होना । पहाड़ के युवाओं की वो बड़ी आवाज राज्य निर्माण आंदोलन के दौर से रहे हैं रहे हैं । पहाड़ी व मैदानी दोनों इलाकों में युवाओं के बीच जबर्दस्त जनाधार भी उत्तराखंड में उनको मजबूती प्रदान करता है । भविष्य में सूबे के 44 लाख से अधिक युवा वोटर को अपनी साधी चाल से सी एम रहते वो साध सकते हैं । युवाओं से उनका याराना देखकर हर किसी को उन पर रश्क हो जाये शायद यही वजह है भाजपा के आम कार्यकर्ता चार माह पहले त्रिवेन्द्र रावत के सी एम पद से हटने के बाद से ये कहने लगा था कि पुष्कर सिंह धामी अपनी राजनीति से पहाड़ से लेकर दून तक को बखूबी साध सकते हैं जो पहाड़ में सोलह आने सच साबित हुई है । गौरतलब है पुष्कर सिंह धामी का नाम त्रिवेन्द्र सिंह रावत के बाद उपमुख्यमंत्री के तौर पर भी ज़ोर शोर चला था लेकिन टीम 11 में जगह बनाने में वो सफल नहीं हो पाये और बड़े मायूस से नजर आए। धामी को अपने समर्पण और काम के बूते इस बात की उम्मीद थी उन्हें समय आने पर बड़ी ज़िम्मेदारी अवश्य ही मिलेगी शायद विधाता ने हार के बाद उनके लिए दमदार स्क्रिप्ट लिखी थी जो आज चम्पावत में जीत  के रूप में सामने आई है ।

हिमालय की गोद में बसे प्रकृत्ति की अमूल्य धरोहर देवभूमि उत्तराखण्ड़ के पिथौरागढ़ में देव भूमि उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ की तहसील डीडीहाट वर्तमान तहसील कनालीछीना की ग्राम सभा हरखोला का तोक टुण्डी गांव में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए एक पूर्व सैनिक के घर में पुष्कर धामी का जन्म 16 सितंबर 1975 को तीन बहनों के पश्चात हुआ। खटीमा में आर्थिक अभाव में जीवन यापन कर सरकारी स्कूलों से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। धामी बचपन से ही स्काउट गाइड, एनसीसी, एनएसएस आदि से जुड़े रहे। वह स्नातकोत्तर एवं मानव संसाधन प्रबंधन और औद्योगिक संबंध में मास्टर्स की डिग्री ले चुके हैं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों को एक जुट करके निरन्तर संघर्षशील रहते हुए उनके शैक्षणिक हितों की लडाई लडते हुए उनके अधिकार दिलाये तथा शिक्षा व्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 1990 से 1999 तक उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में जिले से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न पदों में रहकर कार्य किया। प्रदेश मंत्री के पद पर रहते हुए लखनऊ में हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सम्मेलन में संयोजक एवं संचालक की भूमिका निभाई। राजनीतिक यात्रा के बढ़ते क्रम में इसके बाद उन्होने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई आन्दोलनों में प्रमुखता से भाग लेकर जनसमस्याओं के निदान में गहरी दिलचस्पी दिखाई उनकी योग्यता को भांपकर इस दौरान पार्टी ने उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा में कमान दी । उत्तराखण्ड राज्य गठन के उपरांत पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के साथ ओएसडी यानी सलाहकार के रूप में उनके करीब रहकर 2002 तक कार्य किया। 2002 से 2008 तक छः वर्षो तक दो बार भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। 2007 में कनालीछीना सीट से भाजपा से टिकट पाने में कामयाब नहीं हो पाये लेकिन निराश नहीं हुए । 2012 से वह खटीमा से लगातार दो बार विधायक रहे । 2012 में भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष के तौर पर रुद्रपुर में युवा गर्जना रैली में उन्होने अपनी नेतृत्व क्षमताओं को सभी के सामने बेहतर तरीके से दिखाया । । पुष्कर सिंह धामी मूलतः सीमांत पर्वतीय जनपद पिथौरागढ़ के हैं और तराई की खटीमा विधानसभा उनकी कर्मभूमि रही है जहाँ से वो इस बार भुवन कापड़ी के हाथों पराजित हो गए , वह पहाड़ और मैदान का संतुलन भी साधते हैं। उन पर न ही कोई पर्वतीय न होने का टैग लगा सकता है और न ही मैदानी न होने का लिहाजा उनकी सर्वस्वीकार्यता और युवा शक्ति पर भरोसा देखते हुए भाजपा आलाकमान ने उनके साथ चम्पावत से उत्तराखंड की वैतरणी पार करने का मन बनाया जिसमें वो खरे उतरे ।

भाजपा उनके बरक्स राज्य में त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना चुकी है लेकिन दोनों पहाड़ की अपेक्षाओं में खरे नहीं उतर पाए। त्रिवेंद्र सिंह रावत तो अपनी पार्टी के विधायकों तक के लिए उपलब्ध नहीं हो पाये कार्यकर्ता तो बहुत दूर की बात है । त्रिवेन्द्र सिंह रावत संघ के आशीर्वाद और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी होने के चलते प्रचंड बहुमत वाली उत्तराखंड की भाजपा के मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन उनके सलाहकारों और नौकरशाहों की चौकड़ी ने ही उनको निपटाने में देरी नहीं लगाई वहीं सीधे –साधे तीरथ सिंह रावत को कोरोना के चलते काम करने का बहुत कम समय मिला और संवैधनिक संकटों के चलते उनकी कुर्सी भी सलामत नहीं रह सकी । यही कारण है कि दोनों की विदाई के बाद भाजपा को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो युवाओं के भरोसे पर खरा उतर सके । ऐसे में भाजपा ने नौजवान युवा नेता को राज्य का मुखिया चुना। साथ ही वह कुमाऊं गढ़वाल क्षेत्र के राजपूत समीकरणों को साध सकते हैं । उन पर हरीश रावत की तरह ब्राह्मण विरोधी होने का दाग भी नहीं है। ये हाल के विधान सभा चुनावों के परिणामों ने साबित किया है उनको समाज के हर तबके ने दिल खोलकर अपना वोट दिया है जिसके चलते इस चुनाव में भाजपा का वोट शेयर भी बड़ा है ।  

अब तक राज्य में भाजपा कई मुख्यमंत्री बदल चुकी है। इनमें अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी , भगत सिंह कोश्यारी, पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, कांग्रेस की दूसरी सरकार के दोनों मुख्यमंत्री-गढ़वाल से होने के बावजूद कुमाऊं के सितारगंज से चुनाव लड़े विजय बहुगुणा व हरीश रावत यानी चार मुख्यमंत्री सिर्फ कुमाऊं मंडल से मुख्यमंत्री बने, परंतु यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि इनमें से भगत सिंह कोश्यारी के अलावा भाजपा ने कोई भी मुख्यमंत्री कुमाऊं से नहीं बनाया इसलिए कुमाऊंवासियों में लम्बे समय से भाजपा सरकार के प्रति भारी नाराजगी थी । वैसे भी कुमाऊं मंडल में भाजपा के पास बड़े चेहरे भी गिने-चुने ही हैं।  धामी पूर्व सैनिक एवं किसान स्वर्गीय शेर सिंह धामी के बेटे हैं, इसलिए उनके चयन से पूर्व सैनिकों और युवाओं को भी साधने की कोशिश की गई। भविष्य में पहाड़ में होने वाले परिसीमन को देखते हुए मैदानी इलाकों में सीटों की संख्या में भी भारी इजाफा होने की संभावना है। इस लिहाज से भी पुष्कर धामी भाजपा की भावी संभावनाओं को नए पंख लगा सकते हैं । उत्तराखंड में युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाकर उन्होने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने राज्य के युवाओं में में एक ऐसा भाव पैदा किया जिसके चलते न उनमें अपनी माटी के प्रति प्रेम पैदा हुआ बल्कि उनमें इस जमीन काम करने की ललक भी जगी है । उन्होंने खुद को एक आशावादी और विकासवादी राजनेता के रूप में पेश किया है जिसकी रगों में देश प्रेम और पल –पल उत्तराखंड के विकास की धारा बहती है ।

राजनीती में पुष्कर सिंह धामी होना इतना आसान नहीं है इसके लिए प्रतिभा, जुनून और समर्पण होना चाहिए। वो इस मामले में बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे हैं।  उत्तराखंड की पहाड़ी जमीन के हर उबड़ खाबड़ रास्तों का पता पुष्कर धामी को है। वो युवा मोर्चा के पद पर रहते हुए व्यक्तिगत रूप से कई हजार गाँवों में गए हैं , साथ ही युवाओं से संवाद केंद्र में रहा है । इसका लोहा इनके विपक्षी और धुर विरोधी भी मानते रहे हैं। किसी ने ठीक ही कहा है समय से बड़ा बलवान कोई नहीं, इसीलिए वे राज्य में विकास के काम में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि विकासधारा में सब साथ हों, भले ही विचारधाराओं का अंतर क्यों न हो। यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि आज उत्तराखंड का युवा उनको एक नई नजर से देख रहा है तो ऐसे में पुष्कर धामी का अपनी पहचान को निरंतर प्रखर बनानी होगी । छोटे से सी एम कार्यकाल में  धामी ने जनता के दिलों में  एक विशेष छाप छोड़ी है। पुष्कर सिंह धामी ने छोटे से मुख्यमंत्री के काल में जनसरोकारों के संकल्पों को साकार करने के साथ ही पारदर्शी और ईमानदार शासन की अवधारणा को भी साकार किया है । नौकरशाही को अपने अंदाज में फेंटने के चलते उस दौर से अब तक राज्य की फिजा बदली सी नजर आने लगी है । सीएम ने अपने कार्यकाल में साफ हिदायत दी है नौकरशाही में किसी तरह की गुटबाजी अब नहीं चलेगी और सभी को परफ़ार्म करना ही होगा । सी एम धामी अपने कार्यकाल में अब अफसरों को कैंप कार्यालय या सचिवालय में ही मिलते हैं । धामी ने बहुत परिपक्वता के साथ अपने पिछले कार्यकाल में काम किया है जिसकी मिसाल राज्य के पुराने किसी मुख्यमंत्री के काल में देखने को नहीं मिली । अपने छोटे से कार्यकाल में वो बहुत संभाल -संभाल कर बोले हैं । इस दौर में जहां वो हवाई घोषणाओं से वो जहां बचे वहीं कोई भी ऐसा बयान नहीं दिया है जिससे बवाल मचा हो । सी एम ने जनता दरबार लगाकर जहां आम जनता के लिए अपने आवास के दरवाजे खोले हैं वहीं कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए भी वो सहजता से उपलब्ध हुए हैं । ये धामी की बहुत बड़ी यूएसपी रही है।  

बेलगाम नौकरशाही को साधना बेहद चुनौतीपूर्ण काम इस सूबे में रहा है । सी एम धामी ने अपने अंदाज में ताश के पत्तों की तरह नौकरशाहों को फेंटने का काम किया। यह इस राज्य का दुर्भाग्य ही रहा है पिछले कई दशकों से यहाँ के कामकाज में नौकरशाही का सियासी दखल बहुत अधिक रहा है जिसके चलते यहाँ सरकाएँ अस्थिर होती रही हैं । हर व्यक्ति का समय होता है जब वह शिखर पर पहुंचता है । पुष्कर सिंह धामी इस मामले में भी काफी धनी हैं। हरसैम की कृपा उन पर सदा बनी रही है। उत्तराखंड में युवाओं की राजनीती के केंद्र में हर समय पुष्कर ही रहे । आज भी जब आम आदमी उनको देखता है तो उसे सहसा विश्वास नहीं होता ये वही पुष्कर है जो युवा मोर्चा के अध्यक्ष , विधायक हैं। पुष्कर धामी को खाली समय में जब भी मौका मिलता है तो युवाओं से सीधा संवाद करने में वो पीछे नहीं रहते हैं । उनकी समस्याओं को मौके पर ही निपटाने का प्रयास करते हैं । विचार को लेकर उनके विजन में स्पष्टता, दृढ़ता और गहराई साफ दिखाई देती है । वे उदारमना, बौद्धिक संवाद में रूचि रखने वाले, दिन -रात नए विजन के साथ सोचने वाले और जीवन को बहुत सरल और व्यवस्थित ढंग से जीने वाले व्यक्ति हैं । उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल स्वतः बन जाता है कि उनसे सीखने की ललक हर युवा नेता में होती है । युवा को अपने विमर्श का हिस्सा बनाना उन्हें युवाओं का नायक बनाता है । वे आज भी आधुनिक ढंग से सोचते हैं। धामी की सबसे बड़ी चुनौती अब उत्तराखंड को एक स्थिर सरकार देने, पी एम मोदी के विजन को आगे बढाने की होनी चाहिए ।

 सही मायनों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं । एक बार जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दिखाते हैं । कोरोना काल में भी पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री न होने के बावजूद खाली नहीं बैठे और 18 से 20 घंटे तक बिना रुके काम अनरवत रूप से लोगों की समस्याओं का समाधान अपनी विधानसभा में करते रहे । पुष्कर सिंह धामी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दिखता है और वो हमेशा सकारात्मक उर्जा से सरोबार रहे हैं और यही उर्जा उनको विषम परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है । सूबे के मुखिया के तौर पर वो आज पहाड़ के उस अग्निपथ पर हैं जहाँ लोगो की बड़ी अपेक्षाएं अभी भी उनसे जुडी हैं । पुष्कर धामी के युवा तुर्क के रूप में भाजपा को राज्य में ऐसा दमदार चेहरा मिला है जो युवा जोश से राज्य की तकदीर बदलने का माद्दा रखता है । युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इतिहास की इस घड़ी में यह अवसर मिला है कि वे इस भूगोल को उसकी तमाम समस्याओं के बीच एक नया आयाम दे सकें। पुष्कर सिंह धामी के सामने चुनौतियों का विशाल पहाड़ खड़ा है । इस नई मुख्यमंत्री की पारी में उन्हें राज्य की तमाम चुनौतियों को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि सपनों को सच करने की जिम्मेदारी देवभूमि के भूगोल और इतिहास दोनों ने उन्हें बखूबी दी है। पिछले कार्यकाल में वह राज्य में कड़ा भू क़ानून नहीं ला पाए थे । इस बार उनके पास पर्याप्त समय है । पहाड़ों में पलायन एक बड़ी भीषण समस्या बनी हुई है । पहाड़ का पानी और जवानी आज भी पहाड़ के काम नहीं आ पा रही है । कुछ नये विजन के साथ अब तो आगे बढ़ना ही होगा । धामी के पास अब समय ही समय है । वैसे भी पहाड़ और मैदान की परिस्थितियों की उनको बखूबी समझ है । जाहिर है वे इन चुनौतियों से किसी भी हाल में भागना भी नहीं चाहेंगे। समय का पहिया बहुत तेजी से घूमता रहता है जो कुछ करना चाहते हैं उनके लिए एक- एक पल का बड़ा महत्व होता है। देवभूमि में पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी के बाद से फिजा बदल गई है । युवाओं की उम्मीदें परवान चढ़ रही हैं। केंद्र में नरेंद्र मोदी के पी एम के बाद इस पहाड़ी प्रदेश को युवा हृदय सम्राट के रूप में ऐसा सी एम मिला है जिसके मन में उत्तराखंड के विकास को लेकर एक अलग तरह का विजन है। दोनों 2024 के लोकसभा चुनावों में युवाओं के बीच इसको कैश करने की कोशिश करेंगे जिससे भाजपा की संभावनाएँ चुनाव में बेहतर हो सकेंगी । जमीनी स्तर पर युवा मोर्चे में काम कर चुके मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आने वाले पांच बरस में कुछ ठोस फैसले लेंगे और साफ़ पारदर्शी सरकार देंगे ऐसी उम्मीद उनसे है। चम्पावत जीत के बाद पहाड़ की जनता उन्हें अपनी बधाई देते हुए शायद इस बार यही कह रही है राजनीति में अपनी कप्तानी में खेलने, सही फील्डिंग लगाने, शाट मारने , सही टीम चुनने और अपना हुनर दिखाने के मौके बार बार नहीं मिलते इसलिए इस बार मत चूको पुष्कर धामी !

महान राजनेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की ये पंक्तियाँ उन्हें निश्चित ही पहाड़ के अग्निपथ में आगेक्या हार में , क्या जीत में ,बढ़ने की नई प्रेरणा अवश्य ही देंगी –

किंचित नहीं भयभीत मैं  

कर्तव्य पथ पर जो भी मिला ,

यह भी सही वो भी सही

वरदान नहीं मागूंगा ,

हो कुछ पर हार नहीं मानूँगा  


*लेखक राजनीतिक विश्लेषक है !



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