नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की बायोटेक नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी जेनेटिकली मॉडिफाइड सरसों की कारोबारी खेती को मंजूरी दे चुकी है। इस मंजूरी को लेकर कई किसान संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। कमेटी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत 2012 में स्थापित टेक कमेटी ने विशेष रूप से जीएम फसलों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इस तरह की फसलें जैव सुरक्षा और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पर्यावरण मंत्रालय के बायोटेक नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने अक्टूबर में जीएम सरसों की फसल को मंजूरी दे दी है। इससे देश की जैव विविधता को गंभीर नुकसान हो सकता है। 

वहीं केंद्र ने एडिशनल सॉलीसिटर जनरल के द्वारा सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वहां मंजूरी और प्रक्रिया से 'संबंधित दस्तावेज' कोर्ट के सामने प्रस्तुत करेगी। जज दिनेश माहेश्वरी और सुधांशु धूलिया की अदालत ने केंद्र से हाइब्रिड फसल की खेती को पूरी तरह से मंजूरी देने से फिलहाल रुकने को कहा है। मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट 10 नवंबर को सुनवाई करेगा। जीएम मस्टर्ड को भारतीय किस्म वरुणा की क्रॉसिंग पूर्वी यूरोप की किस्म अर्ली हीरा–2 से करा कर तैयार किया गया है। दावा किया गया है कि डीएमएस-11 की उपज वरुणा से 28 प्रतिशत ज्यादा होगी। सरकार के अनुसार इससे खाद्यान तेलों के निर्यात में भी तेजी से इजाफा होगा। 

वहीं कई किसान संगठनों का कहना है कि जीएम सरसों के सेवन से स्वास्थ्य पर बुरा असर होगा। इसके अलावा शहद उत्पादन का व्यवसाय पूरी तरह से ठप होगा। मधुमक्खी पालन से जुड़े किसान बड़ी संख्या में बेरोजगार होने वाले है। दावा ये भी किया जा रहा है कि शहद के निर्यात में बहुत बड़ी गिरावट आ सकती है। दरअसल, चिकित्सकीय गुणों की वजह जीएम मुक्त सरसों के शहद की मांग विदेशों में ज्यादा है। 



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