नई दिल्ली: देश के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हरियाणा सिख गुरुद्वारा (प्रबंधन) अधिनियम, 2014 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जिसके अंतर्गत राज्य में गुरुद्वारों के मामलों के प्रबंधन के लिए एक अलग समिति का गठन किया गया था। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के एक सदस्य द्वारा दाखिल, हरियाणा सिख गुरुद्वारा अधिनियम को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।

शीर्ष अदालत का फैसला हरियाणा के निवासी हरभजन सिंह द्वारा 2014 में दाखिल की गई एक याचिका पर आया, जिसमें कहा गया था कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 72 कहती है कि एसजीपीसी के संबंध में एक अंतर-राज्य निकाय कॉर्पोरेट के रूप में कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है और कानून में राज्य के कानून को अधिनियमित कर किसी भी विभाजन का कोई प्रावधान नहीं है। याचिका में कहा गया था कि जल्दबाजी में कानून लागू करना न केवल संवैधानिक प्रावधानों और पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है, बल्कि सिख धर्म के अनुयायियों के बीच मतभेद भी पैदा कर सकता है।

कानून के तहत, हरियाणा उस विषय के संबंध में कानून नहीं बना सकता है जहां पहले से ही केंद्रीय कानून है क्योंकि धार्मिक संस्थानों का विषय प्रविष्टि 28 सूची तीन से संबंधित है। कानून के तहत अंतरराज्यीय निकाय कॉर्पोरेट के संबंध में सख्त प्रावधान इसके साथ नहीं जोड़े गए हैं।

याचिका में कहा गया था ‘यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण, सिख गुरुद्वारा चुनाव न्यायाधिकरण के गठन और गुरुद्वारों को 1925 के अधिनियम की धारा 85 के प्रावधानों के भीतर लाने के लिए अधिसूचना सहित कई कार्यों के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा जनादेश दिया गया है।’



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