नई दिल्ली: रेवड़ी कल्चर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए मुफ्त उपहारों के मुद्दे पर विचार करने के लिए एक समिति गठित करने की योजना बनाने के पीछे की मंशा केवल इतनी थी कि वह संसद को प्रस्तुत किए जा सकने वाले सुझावों को पेश कर सके, जो इस मुद्दे पर बहस कर सके और अगर जरूरी लगे तब एक कानून तैयार करे। 

भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने तीन न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता कर कहा कि, मैंने शुरू में सोचा था कि जो लोग अर्थव्यवस्था और लोगों के कल्याण के बारे में चिंतित हैं, वे पूरे मुद्दे पर विचार कर सकते हैं और कुछ सुझाव दे सकते हैं। इस संसद के सामने रखा जा सकता है, जो बहस कर सकती है और कानून बना सकती है। फिर भी इसका विरोध हो रहा है। इस बेंच में जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल हैं। सीजेआई ने कहा कि, ‘आखिरकार, हम यह नहीं कह रहे हैं कि जो भी सुझाव आएं, उन्हें मान लिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में संसद को बहस करनी होती है और फैसला लेना होता है। लेकिन उसके लिए कुछ बैकग्राउंड पेपर की जरूरत होती है। इसकारण मैंने बहस की शुरुआत की। 

मुफ्त रेवड़ियों की बहस एक ‘जटिल मुद्दा’ बताकर चीफ जस्टिस ने कहा कि यह तय करना जरूरी है कि किसे एक मुफ्त रेवड़ी माना जा सकता है और किसे कल्याणकारी उपाय कहा जा सकता है। सीजेआई ने कहा कि ‘कुछ राज्य साइकिल देते हैं। यह बताया गया कि इसने लाइफ स्टाइल को बदल दिया है और उन्होंने विभिन्न जगहों पर जाना शुरू कर दिया है और इसने शिक्षा, व्यवसाय में सुधार किया है। सवाल यह है कि किसे रेवड़ी में शामिल किया जा सकता है और क्या वंचितों को आगे बढ़ाने के लिए वास्तव में जरूरी है? ग्रामीण गरीबों के लिए जिनकी आजीविका इसी पर निर्भर करती है, ऐसे उपायों से बहुत फर्क पड़ता है। इसकारण हम यहां बैठकर इन मुद्दों पर बहस नहीं कर सकते। ये इसतरह के मुद्दे हैं जिन पर देश के संदर्भ में, लोगों के विभिन्न वर्गों और उनके अनुभवों के हिसाब से गौर करना होगा। 

वहीं केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ‘कोई भी दलितों या समाज के किसी भी वर्ग के उत्थान के लिए सामाजिक उपायों को लागू करने पर किसी भी पार्टी की जिम्मेदारी पर सवाल नहीं उठा सकता है। लेकिन कठिनाई तब पैदा होती है जब कोई पार्टी साड़ी बांटती है और कुछ मुफ्त बिजली देने के लिए कहते हैं। मेहता ने कहा कि सवाल यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में अदालत केवल मूक दर्शक बनी रहेगी?



Related news