काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी क्षेत्र को लेकर फिर अपना दावा ठोका हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में घोषित योजनाओं और नीतियों में तीन विवादित क्षेत्रों को शामिल नहीं करने पर विचार-विमर्श के दौरान विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में, प्रधानमंत्री देउबा ने कहा, ‘नेपाल गुटनिरपेक्ष विदेश नीति अपनाता रहा है। नेपाल सरकार ने हमेशा राष्ट्रीय हित को सामने रखा है और अपने पड़ोसियों और अन्य देशों में पारस्परिक लाभ के मुद्दों पर काम किया है। नेपाल सरकार हमेशा अपने क्षेत्रों की रक्षा के लिए तैयार है। लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के क्षेत्र हैं और नेपाल सरकार को उनके बारे में अच्छी समझ है।’

नेपाली प्रधानमंत्री ने आगे कहा, ‘सीमाओं का मुद्दा संवेदनशील है और हम समझते हैं कि इन मुद्दों को कूटनीतिक माध्यमों से बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है। इसके लिए हम राजनयिक माध्यमों से अपने प्रयास कर रहे हैं। हमारी सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं और नीतियों में इस मुद्दे को उचित स्थान दिया गया है।’ इस सप्ताह की शुरुआत में संसद में सरकार की योजनाओं और नीतियों पर विचार-विमर्श में हिस्सा लेते हुए सीपीएन-यूएमएल (नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने तिब्बती मुद्दों के लिए अमेरिका के विशेष समन्वयक उज़रा ज़ेया के ललितपुर में एक तिब्बती शरणार्थी शिविर के दौरे पर देउबा से सवाल किया।

ओली ने भारत के साथ विवादित क्षेत्रों पर देउबा सरकार का रुख पूछा था, जिसके कारण उनके कार्यकाल के दौरान नेपाल और भारत के बीच राजनयिक संबंध काफी प्रभावित हुए थे। नेपाल ने वर्ष 2020 में संविधान में संशोधन करते हुए प्रस्तावना संविधान में एक नए राजनीतिक और प्रशासनिक मानचित्र को शामिल किया। नए नक्शे में लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख का त्रि-जंक्शन शामिल है, जो नेपाल और भारत के बीच विवादित क्षेत्र बना हुआ है। पिछले साल नई दिल्ली और काठमांडू के बीच तनाव नेपाल द्वारा मई के मध्य में ट्राई-जंक्शन सहित राजनीतिक मानचित्र जारी करने के बाद पैदा हुआ था। भारत ने नवंबर 2019 में जारी किए गए नक्शे में लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपना क्षेत्र बताया था।

8 मई, 2020 को कैलाश मानसरोवर को लिपुलेख के माध्यम से जोड़ने वाली सड़क के उद्घाटन के बाद दोनों राष्ट्रों के बीच राजनयिक संबंध और टूट गए, जिसके बाद नेपाल ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण के भारत के कदम पर कड़ी आपत्ति जताई थी। नेपाल की कड़ी आपत्ति के बाद, भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने एक बयान जारी कर कहा था कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से गुजरने वाली सड़क ‘पूरी तरह से भारत के क्षेत्र में स्थित है।’ आपको बता दें कि देउबा से पहले केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार थी, जिस पर चीन का करीबी और भारत से दूरी बनाने का आरोप लगा था। इसे लेकर नेपाल में स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। उनका कहना था कि भारत का नेपाल के साथ सांस्कृतिक संबंध हैं, जिसे चीन के लिए बलिदान नहीं चढ़ाया जा सकता।



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