जयपुर (दैनिक हाक): मिट्टी, पानी, बर्फ और वनस्पतियों से रंगी धरती का हवा-पानी और प्रकाश हम सब साझा करते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। जलवायु परिवर्तन की नकारात्मक आहट सुनाई देने लगी है। मौसम का बदलता मिजाज, समुद्रों का बढ़ता स्तर और ग्लेशियरों का पिघलना हर रोज नये बदलावों को आकार दे रहा है। ऋतु चक्र गड़बड़ाने लगा है। जनवरी-फरवरी सर्दी, अप्रैल-मई गर्मी, जून से सितंबर तक बारिश अब नहीं रहती। जाने कब कौनसा मौसम आ जाए। साल दर साल बढ़ती गर्मी चिंताजनक स्तर तक जा पहुंची है। भारत ने हाल ही अपना ऐतिहासिक रूप से सबसे गर्म मार्च महीना देखा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 11 मार्च से 18 मई, 2022 के बीच 16 राज्यों में 280 हीटवेव चलीं। यानी इतनी बार तापमान सामान्य से 6.4 डिग्री ज्यादा रहा। पिछले 12 वर्ष के मुकाबले 2022 में सबसे ज्यादा हीटवेव चलीं। इसमें से 54 प्रतिशत हीटवेव 5 राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात व हरियाणा के हिस्से आयी। वहीं पिछले 15 साल में 11 साल सबसे गर्म रहे। देश में पिछले 5 साल में मात्र 0.5 प्रतिशत हरियाली बढ़ी। हालात ऐसे रहे कि 638 जिलों में से 244 में तो हरियाली में कमी दर्ज की गई। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की छठी असेसमेंट रिपोर्ट में पाया गया है कि दुनिया पिछले आकलन के हिसाब से 10 साल पहले ही लगभग वर्ष 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म हो सकती है। बात भारत की करें तो रिपोर्ट में साफ तौर पर चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में भारत को न सिर्फ लगातार तीव्र गर्मी का अनुभव करना होगा, बल्कि अत्यधिक वर्षा की घटनाओं और अनिश्चित मानसून के साथ-साथ, मौसम संबंधी आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। यह रिपोर्ट भारत के लिए एक वेक-अप कॉल है। तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित करना भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम यहां पहले ही चक्रवात, तूफान, बाढ़, सूखा और हीट-वेव आदि की बढ़ती संख्या का सामना कर रहे हैं। करीब 7500 किलोमीटर लम्बी तटीय रेखा के साथ तीन ओर से समुद्र से घिरा भारत जलवायु परिवर्तन के चलते गर्म होते महासागरों खासतौर से गर्म हिन्द महासागर और पिघलते हिमालय ग्लेशियर के चलते बढ़ते समुद्र स्तर का सामना करेगा।

विश्व की सभी बड़ी पर्वत मालाएं आल्प्स, एंडीज, रॉकीज, अलास्का, हिमालय बर्फ विहीन होती जा रही हैं। हमेशा बर्फ से ढके ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक 150 से 200 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ हर साल खो रहे हैं। पिछले दिनों अंटार्कटिक और आर्कटिक दोनों ही जगह तापमान में अचानक ऐसा उछाल आया कि सारे रिकॉर्ड टूट गए। अंटार्कटिक में बर्फ 1979 के दशक के बाद सबसे कम हो गई है। हालांकि अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इसके लिए जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेदार है। परंतु वैज्ञानिक इस बात की चेतावनी दे चुके हैं कि दोनों ही ध्रुवों का तापमान जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है, भले ही उसमें धीमे-धीमे वृद्धि हो।

भयंकर गर्मी का असर दक्षिण एशिया में होने की संभावना सबसे ज्यादा है। यानी दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला क्षेत्र इस खतरे की पहुंच में सबसे ज्यादा है। भारत में दुनिया की एक तिहाई से ज्यादा आबादी रहती है। संयुक्त राष्ट्र के जेनेवा स्थित विश्व मौसम संगठन के मुताबिक इस बात की लगभग 50 फीसदी संभावना है कि अगले पांच साल में कम से कम एक बार ऐसा होगा जबकि धरती का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के मुकाबले 1.5 डिग्री ज्यादा रहेगा। नतीजा, जंगलों में आग लगने की ज्यादा घटनाएं होंगी। नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (नोआ) के वैज्ञानिकों के मुताबिक लोगों की गतिविधियों के कारण होने वाले ग्रीन हाउस गैस प्रदूषण ने 1990 की तुलना में 2021 में वातावरण में 49 फीसदी अधिक गर्मी को बढ़ाया।

विरोधाभास देखिए कि मानव ने विज्ञान और तकनीक के जरिए दुनिया को ‘ग्लोबल विलेज’ बनाया तो कार्बन डाइऑक्साइड का जवाब ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के रूप में सामने आया, जिसने दुनिया को कई हिस्सों में बांट दिया। इतना कि विकसित और विकासशील देशों के वैज्ञानिक आमने-सामने आ गए हैं और बदलते मौसम के लिए आपस में खींचतान शुरू हो गई है। कार्बन डाइऑक्साइड (सीओटू) अब तक की सबसे प्रचुर मात्रा में मानव-उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैस है। यातायात, विद्युत उत्पादन, सीमेंट निर्माण, वनों की कटाई, कृषि और कई अन्य तरीकों से हर साल लगभग 36 बिलियन मीट्रिक टन सीओटू उत्सर्जित होती है। आज उत्सर्जित सीओटू का एक बड़ा हिस्सा वातावरण में एक हजार से अधिक वर्षों तक बना रहेगा। भौतिक विज्ञानी जॉन टिण्डेल ने 1860 में चेतावनी दे दी थी कि यह गैस कुछ भी गलत कर सकती है। लेकिन औद्योगिक क्रांति ने जब पूंजी का ढेर लगाना शुरू किया तो समृद्धि के ढेर पर बैठे मानव की आंखें चौंधियाने लगीं। पर्यावरण के प्रति उसने बेरुखी ओढ़ ली। यह जलवायु अस्थिरता हमारे साथ-साथ इक्कीसवीं सदी तक चली आयी है। नतीजा क्या निकला? अपनी सीमाओं को लांघते समुद्र, बढ़ती बाढ़, बढ़ते अकाल, असहनीय गर्मी और पर्यावरण को मुंह चिढ़ाती असमय आती आपदाएं। पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए यह एक चेतावनी है।

आसमान में उड़ते हवाई जहाज भी कार्बन उत्सर्जन को बहुत ज्यादा बढ़ाते हैं। डाटा एजेंसी स्टैटिस्टा के मुताबिक 2018 में 3.81 करोड़ हवाई जहाज दुनिया भर में उड़े। दस साल पहले के मुकाबले यह संख्या दोगुनी है। अगर आप दिल्ली से बेंगलुरु के बीच 3400 किलोमीटर लंबी यात्रा हवाई जहाज से करें तो एक बार आने-जाने में 0.631 टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में मिल जाता है। जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हर इंसान के पास साल भर में सिर्फ 0.600 टन कार्बन का बजट है। तो अनुमान लगाया जा सकता है कि बाकी उड़ानें पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाएंगी। विकराल होती इस समस्या से अब भी पार पाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और निरंतर कमी लानी होगी। जहां मुमकिन हो कटौती करनी चाहिए। ऐसा करने से न सिर्फ वायु गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, बल्कि अभी किए जा रहे कड़े कदमों के परिणामस्वरूप 20 से 30 वर्षों में वैश्विक तापमान स्थिर हो सकता है। धरती की गर्मी को बढ़ने से रोका जा सका तो जलवायु परिवर्तन भी रुक सकेगा।  



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