सुधीर जोशी 

महाराष्ट्र की राजनीति किस ओर जाएगी, उसका भविष्य क्या होगा, इस पर अब सामान्य व्यक्ति भी सोचने लगा है. राज्य की पूर्ववर्ती महाविकास आघाडी के पतन हुए एक माह का समय व्यतीत हो चुका है, बावजूद इसके एकनाथ शिंदे सरकार के मंत्रिमंडल का गठन नहीं हुआ है, यह भी संभव है कि आने वाले कुछ दिनों में एकनाथ शिंदे सरकार का मंत्रिमंडल अस्तित्व में जाए, इन सबके बीच शिवसेना के लिए राहत की बात यह है कि मातोश्री पर शिवसेना के कार्यकर्ताओं तथा पदाधिकारियों ने उद्धव ठाकरे से मुलाकात करके उन्हें यह भरोसा दिलाया है कि हम सब आपके साथ हैं. लेकिन मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के लिए जो सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात है वह है, आदित्य की शिवसंवाद यात्रा है। इस शिवसंवाद यात्रा ने शिवसेना को कई तरह से राहत दी है। राज्य के जिन हिस्सों में अब तक आदित्य की शिवसंवाद यात्रा पहुंची है, वहां उसका जोरदार स्वागत हुआ है।

भिवंडी-नाशिक में शिवसंवाद यात्रा को मिले प्रतिसाद ने यह बता दिया है कि जल्दी शिवसेना अपने संकट से उबर जाएगी। शिवसेना को लेकर दो तरह की विचारधारा सामने आ रही है, पहली विचारधारा यह है कि अब शिवसेना में वह बात नहीं रही, जो पहले थी, जबकि दूसरी विचारधारा वाले लोग आदित्य ठाकरे को लंबी रेस का घोडे के रूप में देख रहे हैं। शिवसेना प्रमुख के रूप में उद्धव ठाकरे भले ही लोगों के बीच अपनी पहचान नहीं बना पाए हों, लेकिन उनकी तुलना में आदित्य ठाकरे की लोगों के बीच अच्छी पैठ बनी है. हालांकि लोगों के बीच से यह आवाजें कभी-कभी आती हैं कि आदित्य ठाकरे परिपक्व नहीं हैं, उन्हें शिवसेना को इतनी जल्दी मैदान में नहीं उतारना चाहिए था।

जन लोगों ने शिवसेना का दामन छोड़ा है, उनका भी मानना है कि आदित्य ठाकरे को जरा ज्यादा ही महत्व दिया जा रहा है। भाजपा से बढ़ी दूरियां तथा राकांपा-कांग्रेस से शिवसेना की निकटता ने एकनाथ शिंदे तथा उनके समर्थन में आए शिवसैनिकों ने भाजपा से हाथ मिलाया और महाविकास आघाड़ी सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। सच तो यह है कि शिवसेना आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें।

पिछले लगभग एक माह में शिवसेना की स्थिति का अवलोकन करें तो यह बात सामने आएगी कि शिवसेना दो मार्ग पर चलती हुई नज़र आ रही है. एक मार्ग एकनाथ शिंदे तथा उनसे समर्थन में आए शिवसैनिकों का है, तो दूसरा मार्ग मातोश्री पर जाकर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के समक्ष यह संकल्प लेने वालों का है कि चाहे जो कुछ भी हो जाए, हम आपके साथ ही रहेंगे. हमारी शिवसेना तो वहीं है, जिसका सारथी तो मातोश्री में रहता है. जो लोग एकनाथ शिंदे के साथ हैं, उन्हें मंत्री पद की आस है, अगर उनमें से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया तो वह नाराज होकर मातोश्री की ओर फिर से कूच कर सकता है, इसलिए एकनाथ शिंदे अपने साथ गए सभी विधायकों को खुश करने की कोशिश में है, शायद यही वजह है कि अभी तक एकनाश शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन उनके मंत्रीमंडल का गठन नहीं किया है।

बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में एकनाथ शिंदे की सरकार का मंत्रिमंडल बन जाए, लेकिन सरकार बनने के बाद भी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से ज्यादा उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की बात ही चलेगी, ऐसे में यह स्थिति भी आ सकती है कि शिंदे सेना के लोग बहुत जल्दी परेशान हो जाए और अपना रुख मातोश्री की ओर करें. शिंदे के साथ बगावत करने वाले विधायक इस बात से बेहद प्रसन्न हैं कि एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई है, अब तो हमारी ही चलेगी, लेकिन शिंदे को मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी पीछे की जो राजनीति है, वह शायद न तो एकनाथ शिंदे समझ पा रहे हैं, न ही उनसे साथ आए विधायक। शिवसेना खुद को आने वाले दिनों के लिए तैयार कर रही है, इसीलिए शिवसेना के युवा नेता आदित्य ठाकरे ने शिव संवाद यात्रा निकाली. इस यात्रा के कारण शिवसैनिकों में उपजी निराशा काफी हद तक कम हुई है।

 एक तरफ आदित्य ठाकरे शिवसंवाद यात्रा के माध्यम से राज्य की जनता का मन टटोल रहे हैं तो दूसरी तरह उद्धव ठाकरे मातोश्री में आए शिवसैनिकों, शिवसेना के पदाधिकारियों के संकल्प तथा शिवसेना में उनके आजीवन रहने के फैसले से आनंदित हो रहे हैं। शिवसंवाद यात्रा को मिल रहा व्यापक समर्थन तथा मातोश्री पर शिवसैनिको की ओर से लिए गए संकल्प से शिवसेना के अंदर मची हलचल काफी हद कर कम हुई है, लेकिन यहां यह विशलेषण करना भी जरूरी है कि क्या केवल शिवसंवाद यात्रा में आदित्य ठाकरे के हो रहे शानदार स्वागत या फिर मातोश्री में शिवसेना में ही रहने के लिए शिवसैनिकों की ओर लिया संकल्प काफी होगा, क्या शिवसंवाद यात्रा से ऐसी स्थिति बनेगी कि हर कोई कहेगा कि शिवसेना ही सबसे अच्छी है, शायद ऐसा सोचना ठीक नहीं है, यह चिंतन जल्दीबाजी में बनी विचारधारा के अलावा कुछ और नहीं होगा, इसलिए शिवसंवाद यात्रा को शिवसेना की आगामी सफलता से जोड़कर देखना ठीक नहीं है।

आज जिस दौर से शिवसेना गुजर रही है, उस बारे में सूक्ष्म चिंतन करने की जरूरत है, जब तक इस बात पर गंभीरता से चिंतन नहीं किया जाएगा कि कहां गलती हुई है, तब तक शिवसेना पर आया संकट दूर नहीं होगा. शिवसेना प्रमुख को इस बात की ओर भी ध्यान देना होगा कि सत्ता के लिए वे ऐसे समझौते कतई न करे जो शिवसेना के आदर्श पर फिट न बैठे। ढाई साल राकांपा-कांग्रेस के साथ रहकर शिवसेना को जो नुकसान हुआ है, उसे ध्यान में रखते हुए शिवसंवाद यात्रा से जो कुछ भी हासिल होगा या फिर मातोश्री में जाकर शिवसेना के प्रति निष्ठा जताने वाले हर चेहरे को अगर शिवसेना अपने मजबूत स्तंभ के रूप में देखेगी तो उसका फायदा निश्चित रूप से शिवसेना को होगा।

आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही शिवसेना को फिर से पूरी ताकत के साथ खड़ा करने के लिए आदित्य ठाकरे शिव संवाद यात्रा के माध्यम से जोर लगा रहे हैं, वह शिवसेना के लिए ऐसी ताकत बने कि उसे फिर कभी राकांपा-कांग्रेस रूपी बैसाखियों का सहारा न लेना पड़े। बहरहाल आने वाले कुछ दिनों में यह साफ हो जाएगा कि शिवसेना ठाकरे परिवार की रहेगी या एकनाथ शिंदे नए शिवसेना प्रमुख के रूप में सामने आएंगे, हालांकि इस बात के आसार बहुत कम हैं कि शिवसेना पर एकनाथ शिंदे का मालिकाना हक हो जाए, क्योंकि शिवसेना एक सामाजिक संगठन है, इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि शिवसेना के पास आज की तारीख किसने विधायक, सांसद हैं. शिवसेना के गठन के समय ही यह तय हो गया था कि विपरीत परिस्थिति में भी शिवसेना ठाकरे परिवार का ही हिस्सा रहेगी. अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में शिवसेना के समक्ष और कौन-कौन सी परेशानी आती है और उसे शिवसेना नेता किस तरह से हल करते हैं।  


—दैनिक हाक फीचर्स



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