डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

पर्यूषण पर्व का दूसरा दिन है उत्तम मार्दव। पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है- आत्मा में अवस्थित होना। जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है-आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है-कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय-व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ- सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं।


मृदुता आत्मा का स्वभाव है। मृदु स्वभाव को जान करके मृदु बनना। मृदोर्भावः मार्दवः, जो मार्दव का भाव है। जो मृदुता का भाव है वही मार्दव है, सरलता है। सरल स्वभावी मार्दव स्वभावी, व्यक्ति सुगति के पात्र बनते हैं, जो बहुत अकड़ते हैं वे दुर्गति के पात्र बनते हैं, इसलिए आचार्य कहते हैं कि अकड़ो मत। आधि, व्याधि से दूर समाधि की यात्रा करने का दिन। चित्त में मृदुता और व्यवहार में विनम्रता ही मार्दव है। यह मान कषाय के अभाव में प्रकट होता है। जाति, कुल, रूप, ज्ञान, तप, वैभव, प्रभुत्व, ऐश्वर्य सम्बन्धी अभिमान मद कहलाता है। इन्हें विनश्वर समझकर मानकषाय को जीतना उत्तम मार्दव धर्म कहलाता है।


मंच, माईक और माला से दूर रखता है मार्दव धर्म। मार्दव एक आत्मिक गुण है, जिसमें सहृदयता तथा सर्वहितकारिता है। जो मनस्वी पुरुष कुल, रूप, जाति, बुद्धि, तप, ज्ञान और शील के विषय में थोड़ा भी घमण्ड नहीं करता, सबके प्रति विनयशील रहता है, उसके मार्दव धर्म होता है।

कठोरता नहीं होना उसका नाम है मार्दव। उत्तम मार्दव धर्म का मतलब अपने आत्म स्वभाव को उत्तम प्रकार से समझें। अपने में मृदुता होना चाहिए, कठोरता नहीं होना चाहिए। दूसरा दुखी हो रहा है, भूखा मर रहा है लेकिन हमको दया नहीं आती। दया, प्रेम, सरलता, करुणा ये गुण तो प्रत्येक जीवात्मा में होना चाहिए, उसका विकास होना चाहिए। 

अहंकार के कारण से धर्म तो छूटता ही है, परिवार के भी टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं। बड़े भाई और छोटे एक समय तक बहुत प्रेम से रहते हैं। लेकिन किसी चीज का अहंकार आड़े आ गया तो दोनों का आपस में झगड़ा होता है फिर तुम्हारा घर अलग हमारा घर अलग। अहंकार के कारण से रिश्ते में भी खटास हो जाती है, हम उनके घर नहीं जायेंगे। इसलिए अहंकार का त्याग करें। 

ज्ञान का अहंकार नहीं करना पूजा का अहंकार नहीं करना। धन का, पद का, प्रतिष्ठा का, जमीन-जायदाद का लोगों को बहुत अहंकार होता है।

अहंकार करने वाले लोगों का अहंकार कभी भी नहीं रहता। कौरव का, रावण का नहीं रहा, कंस कृष्ण को कुछ नहीं समझता था, लेकिन उसका भी मान नहीं रहा।

अहंकार किसी का टिकता नहीं। अहंकार को कैसे छोड़ें? मान को कैसे छोड़ें? अहंकार को छोड़ने का एक ही उपाय है। ज्ञान को जानें तो मान छूट जाएगा, चैतन्य स्वभाव को जानें तो अहंकार छूटेगा। नहीं तो अहंकार अपने आप छूटनेवाला नहीं है।


कठोरता नहीं होना उसका नाम है मार्दव। उत्तम मार्दव धर्म का मतलब अपने आत्म स्वभाव को उत्तम प्रकार से समझें। अपने में मृदुता होना चाहिए, कठोरता नहीं होना चाहिए। दूसरा दुखी हो रहा है, भूखा मर रहा है लेकिन हमको दया नहीं आती। दया, प्रेम, सरलता, करुणा ये गुण तो प्रत्येक जीवात्मा में होना चाहिए, उसका विकास होना चाहिए। 

अहंकार के कारण से धर्म तो छूटता ही है, परिवार के भी टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं। बड़े भाई और छोटे एक समय तक बहुत प्रेम से रहते हैं। लेकिन किसी चीज का अहंकार आड़े आ गया तो दोनों का आपस में झगड़ा होता है फिर तुम्हारा घर अलग हमारा घर अलग। अहंकार के कारण से रिश्ते में भी खटास हो जाती है, हम उनके घर नहीं जायेंगे। इसलिए अहंकार का त्याग करें। 

ज्ञान का अहंकार नहीं करना पूजा का अहंकार नहीं करना। धन का, पद का, प्रतिष्ठा का, जमीन-जायदाद का लोगों को बहुत अहंकार होता है।

अहंकार करने वाले लोगों का अहंकार कभी भी नहीं रहता। कौरव का, रावण का नहीं रहा, कंस कृष्ण को कुछ नहीं समझता था, लेकिन उसका भी मान नहीं रहा।

अहंकार किसी का टिकता नहीं। अहंकार को कैसे छोड़ें? मान को कैसे छोड़ें? अहंकार को छोड़ने का एक ही उपाय है। ज्ञान को जानें तो मान छूट जाएगा, चौतन्य स्वभाव को जानें तो अहंकार छूटेगा। नहीं तो अहंकार अपने आप छूटनेवाला नहीं है।


मार्दव धर्म मान कषाय के अभाव में उत्पन्न होता है। रावण जैसा शक्तिशाली, ज्ञानी, धनवान अनेक ऋद्धियों का स्वामी, उच्च कुलीन, सुंदर, पुण्यात्मा और धार्मिक होते हुए भी अव अपने अहंकार के कारण इस लोक में निंदा को प्राप्त हुआ और मरकर पर लोक में नरक गया। जब भी मान की बात आती है तो रावण का नाम सबसे पहले लिया जाता है जिसके कारण उसने अपना सर्वस्व गंवा दिया। मान आठ प्रकार का बताया है- धन का मान, बल का मान, बुद्धि का मान, तप का मान, उच्च कुल का मान, सुदर शरीर का मान और उच्च पद का मान। जो इन आठों को पाकर भी घमंड, अहंकार नहीं करता उसको मार्दव गुण होता है। 

—दैनिक हाक फीचर्स





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