तिरुवनंतपुरम : भीषण गर्मी से जूझ रहे देश में केरल ही वह द्वार है जो मानसून आवक की सुखद सूचना देता है। इस बार यहां मानसून अपने निर्धारित समय से 3 दिन पहले पहुंचा, लेकिन अब आगे बढ़ने की गति धीमी हो गई है। तिरुवनंपुरम में स्थित क्षेत्रिय मौसम विभाग ने बताया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून समय से पहले राज्य में दस्तक जरूर दी, लेकिन अब तक बारिश औसत से 50 फीसदी कम हुई है। बीते शनिवार को तिरुवनंतपुरम के कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो कि मानसून के शुरुआती दौर के हिसाब से काफी असमान्य था। मौसम विभाग के अनुसार, आमतौर पर मानसून आने के बाद राज्य के कई हिस्सों में औसतन 6-8 सेंटीमीटर की बारिश होती है। मगर इस बार बीते शुक्रवार को अलाप्पुझा जिले के मानकोम्पू इलाके में सबसे ज्यादा बारिश सिर्फ 5 सेंटीमीटर हुई।

मौसम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य में वर्षा इसलिए कम रही क्योंकि कोई सक्रिय मौसम प्रणाली नहीं पैदा हुई। लिहाजा मानसून की गतिविधियां नहीं बढ़ पाईं। अधिकारी ने यह भी बताया कि मौसम प्रणाली के अलावा तेज हवाएं भी नहीं चलीं, जिसकी वजह से राज्य में हल्की बारिश हुई। वहीं स्काईमेट वेदर सर्विसेज के अनुसार, राज्य में ऐसी स्थिति अगले एक सप्ताह तक रह सकती है, जिसकी वजह से भारी बारिश नहीं होगी। स्काइमेट ने यह भी बताया है कर्नाटक के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश हो रही है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून को देश की जीवन रेखा माना जाता है। आमतौर पर यह 1 जून को केरल में पूरी तरह से सेट हो जाता है और उत्तर-पूर्व की तरफ आगे बढ़ता है। 15 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है। अनुमान लगाया जा रहा है कि श्रीलंका के ऊपर बने साइकलोनिक सर्कुलेशन और अरब सागर में पैदा हुए एक पश्चिमी हवा के प्रभाव से अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है। स्काइमेट का अनुमान है कि केरल में 7 से 10 जून के बीच मध्यम से भारी बारिश होने की संभावना है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में केरल में होने वाली बारिश के पैटर्न में बदलाव हो रहा है। राज्य मे अगस्त और सितंबर के महीने में यानी मानसून के अंत में बारिश तेजी से हो रही है। वहीं इस साल राज्य में 1 मार्च से 18 मई तक 460 मिमी औसत प्री-मानसून बारिश हुई, जबकि इस दरम्यान औसत 235 मिमी ही बारिश होती थी।

मई महीने में मानसून पूर्व भारी बारिश से राज्य के कई इलाकों में फसलों को बेहद नुकसान हुआ। खासकर सब्जी की खेजी बेहद प्रभावित हुई। वहीं कुछ हिस्सों में धान की फसल और केले की फसल भी बर्बाद हो गए। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश के पैटर्न में कई बदलाव हो रहे हैं।



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