सुधीर जोशी*

कल कांग्रेस तक कांग्रेस के खासखास कहे जाने वाले कपिल सिब्ब्ल अब समाजवादी पार्टी के सहारे राज्यसभा म पहुंचने के प्रयास कर रहे हैं. हालांकि सिब्बल यह कह रहे हैं कि उनके रिश्ते अभी-भी अच्छे हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार कपिल सिब्ब्ल ने कांग्रेस क्यों छोड़ी, इसके क्या कारण हैं, इसकी जानकारी उन्हें बखूबी है कि सिब्बल ने कांग्रेस क्यों छोड़ी. राजनीतिक जानकारों की ओर से यह चर्चा की जा रही है कि सिब्बत ने यूं ही कांग्रेस नहीं छोड़ी,

इसके पीछे उनका कोई न कोई राजनीतिक स्वार्थ जरूर होगा. सिब्बल एक तरफ यह कह रहे हैं कि उनके कांग्रेस से रिश्ते अच्छे है, लेकिन अब कांग्रेस छोड़ने का वक्त आ गया है. कांग्रेस और मेरे रिश्तों में कोई खटास नहीं है. मेरे आज भी उनसे अच्छे संबंध हैं, लेकिन इस्तीफ़ा देने का वक्त आ गया था. संबंध अच्छे होने के वाबजूद भी पार्टी छोड़ने का निर्णय बात कुछ समझ में नहीं आई. सिब्बल राजनेता होने के साथ-साथ वकील भी हैं. राम मंदिर के मामले में उन्होंने अपनी बेबाक राय भी दी थी. राजनीति के पैतरों के साथ-साथ सिब्बल कानूनी दांवपेंच भी खूब जानते हैं. समाजवादी पार्टी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल करने के बाद कपिल सिब्बल ने जो कुछ कहा उससे इस बात की पुष्टि होती है कि उन्हें यह लगता है कि कांग्रेस में अब उनके दिन लद गए थे. काफी लंबा अर्सा कांग्रेस में व्यतीत करने वाले कपिल सिब्बल के कांग्रेस में व्यतीत किए गए वक्त को याद करते पर इस बात का खुलासा होता है कि कपिल सिब्बल कांग्रेस के प्रति पूरी तरह से वफादार थे, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि सिब्बल का कांग्रेस के प्रति मोह भंग हो गया. कपिल सिब्बल कभी कांग्रेस छोड़ भी सकते हैं, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. राजनीति क्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें शामिल लोग पद प्रतिष्ठा को ज्यादा महत्व देते हैं. सिब्बल राज्यसभा में कांग्रेस की ओर से फिर से उम्मीदवारी चाहते थे, लेकिन वह नहीं मिली, इसलिए उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया. सपा के भरोसे राज्यसभा जाने की जगह कपिल सिब्बल ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की होती तो कांग्रेस में उनके प्रति आदर भाव पहले की तुलना बढ़ जाता, लेकिन सिब्बल ने वैसा न करके निदर्लीय के तौर पर राज्यसभा में जाना बेहतर समझा. कांग्रेस छोड़कर निदर्लीय के तौर पर राज्यसभा में जाने पर कपिल सिब्बल को पहले जैसा ही महत्व मिलेगा, ऐसा नहीं लगता क्योंकि जो नेता किसी पार्टी में लंबे समय से रहने के बाद अपनी छोड़कर दूसरी निदर्लीय हो जाए तो उसके प्रति आम धारणा बहुत बदल जाती है. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्रित्व काल में कई कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ी और भाजपा में शामिल हुए. राकांपा के सचिन अहिर ने शिवसेना का दामन थामा, जबकि भाजपा के एकनाथ खड़से राकांपा में शामिल हो गए. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे शिवसेना में रहते हुए मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका आगे चलकर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से मनमुटाव हो गया और उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया. राणे ने जिस लक्ष्य को सामने रखकर कांग्रेस का दामन थामा था, वह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका और उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थामने का मन बनाया और बहुत सी जद्दोजहद के बाद भाजपा में प्रवेश किया. चाहे नारायण राणे हो, एकनाथ खड़से या फिर कोई अन्य बड़ा नेता जिसने अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थामा है, उसने अपनी लोकप्रिया खुद ही समाप्त कर ली. भाजपा में रहते समय एकनाथ खड़से का नाम चर्चाओं में

रहता था, उनके नाम के आगे दिग्गज नेता शब्द जुड़ता था. शिवसेना में रहते समय नारायण राणे की तूती बोलती थी, जब वे कांग्रेस में थे, उस वक्त उनकी आवाज थोड़ी दब गई और जबकि वे भाजपा के नेता बने हैं, तो पता ही नहीं चल रहा है, वे कहां हैं, ऐसी ही बात राकांपा में लंबे समय तक रहे सचिन अहिर के बारे में भी देखने को मिल रही है. किसी पार्टी में लंबा वक्त गुजार चुके नेता जब किसी दूसरी पार्टी का दामन थामते हैं तो बात बहुत दूर तलक जाती है, कुछ ऐसी ही बात कपिल सिब्बल के बारे में भी देखने को मिल जाए तो इसमें किसी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. इस्तीफ़ा देने की वजह के बारे में पूछे जाने पर कपिल सिब्बल ने कहा कि कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने की कोई वजह नहीं है. एक परिवार से 30-31 साल से जुड़े थे, लेकिन अब लगा कि वक्त आ गया है मुझे कांग्रेस पार्टी छोड़कर स्वतंत्र तौर पर अपनी आवाज उठानी चाहिए.

कपिल सिब्बल का कहना है कि अगर निर्दलीय के तौर पर उन्हें सदन में जगह मिलती है तो वे एक आज़ाद प्रतिनिधि के तौर पर संसद में आवाज़ उठाएंगे. कांग्रेस में रहते हुए कपिल सिब्बल जो कुछ कहते करते थे, उस पर चर्चाएं होती थीं, उन्हें गंभीरता से लिया जाता था, लेकिन निदर्लीय के तौर पर राज्यसभा सदस्य के तौर पर जब कपिल सिब्बल कुछ कहेंगे तो उसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाएगा. जिस कपिल सिब्बल ने खुले तौर पर यह कहा था कि गांधी परिवार को कांग्रेस का नेतृत्व छोड़ देना चाहिए, लेकिन उन्होंने पार्टी छोड़ते वक्त ये क्यों कहा कि उन्हें कांग्रेस से कोई गिला-शिकवा नहीं है. कपिल सिब्बल के बयानों में दिखायी दे रहा दोहरापन यह बता रहा है कि वे कांग्रेस छोड़ने के कारण बताना नहीं चाहते. वे कांग्रेस से नाता तोड़ने के बाद भी यही कह रहे हैं कि उनके कांग्रेस से रिश्ते बिगड़े नहीं हैं. पेशे से वकील कपिल सिब्बल एक कसे हुए राजनेता हैं, वे यह बखूबी जानते हैं कि कहां कब और कितना बोलना है. तीन दशक तक कांग्रेस में रहने के बाद दामने थामने वाले सिब्बल दोहरी मानसिकता में हैं, इसलिए भविष्य में फिर से कांग्रेस में जाने की स्थिति बनी तो उसमें कोई बाधा न आए इसलिए कपिल सिब्बल ने कांग्रेस छोड़ी तो जरूर पर पार्टी छोड़ते समय कांग्रेस या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा. कपिल सिब्ब्ल सधे हुए राजनेता और वकील हैं, इसीलिए कांग्रेस में गांधी परिवार से खुलेआम टकराने के बावजूद उन्होंने शब्दों की मर्यादा कभी नहीं खोई है.

सिब्बल की राजनीति की धुरा कुछ ऐसी है कि उनके लिए भाजपा के दरवाजे कभी नहीं खुल सकते, इसलिए वे कांग्रेस से अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहते. सपा-बसपा का दामन थाम कर वे लंबे समय तक अपना असर नहीं दिखा पाएंगे और एक न एक दिन उन्हें फिर कांग्रेस में ही वापस आना पड़ेगा. वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि कपिल सिब्बल कांग्रेस नेतृत्व की खामियों पर सबसे ज्यादा मुखर थे, लेकिन उन्होंने हार्दिक पटेल और सुनील जाखड़

जैसी तल्ख टिप्पणी कभी नहीं की. उन्होंने कांग्रेस छोड़ी है, लेकिन किसी नई पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं. राज्यसभा में वह भले ही समाजवादी पार्टी के समर्थन से पहुंचेंगे लेकिन एक आज़ाद मेंबर के तौर पर अपनी बात रखेंगे.

राजनीति में इसे एक दरवाज़ा खुला रखना कहा जाता है. सिब्बल ने यही किया है, इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस के असंतुष्ट गुट G-23 के नेताओं में सिब्बल ने कांग्रेस नेतृत्व के ख़िलाफ़ सबसे खुला मोर्चा लिया था, इसलिए पार्टी नेतृत्व के साथ उनके रिश्ते काफी कड़वे हो गए थे. लिहाज़ा उनके लिए कांग्रेस में रहना अब नामुमकिन था. वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं, दो साल पहले G-23 बना था. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने उनके उठाए मुद्दों को तवज्जो नहीं. उल्टे वो G-23 के नेताओं में छोटे-छोटे पद बांट कर इसमें फूट डालने लगा. आखिरकार बेचैनी और छटपटाहट में सिब्बल ने सीधे तौर पर गांधी परिवार से कांग्रेस नेतृत्व छोड़ने की मांग कर डाली'' क्या सिब्बल ने पार्टी में सुधार की बात न सुने जाने पर निराश होकर इस्तीफ़ा दिया या फिर उनकी नज़र राज्यसभा की सीट पर थी? कांग्रेस की ओर से राज्यसभा की तीन-चार सीटों के लिए नामांकन होने वाले हैं. पार्टी नेतृत्व के ख़िलाफ़ खुल कर बोलने के बाद सिब्बल को जरूर लगा होगा कि अब वे कांग्रेस से दोबारा राज्यसभा में नहीं पहुंचने वाले. सिब्बल कट्टर भाजपा विरोधी हैं. लिहाज़ा उनके भाजपा में जाने का सवाल ही नहीं उठता. अब वो निर्दलीय सांसद के तौर पर राज्यसभा में आवाज़ उठाएंगे.

कपिल राज्यसभा निर्दलीय सांसद के तौर पर भी कांग्रेस का ही काम करेंगे. यानी भाजपा विरोधी विचारधारा की ही आवाज़ बनेंगे, लेकिन क्या कांग्रेस को इसकी परवाह है, क्या वह कपिल सिब्बल जैसे नेताओं के पार्टी से जाने और इसके असर की चिंता करती है.विनोद शर्मा का मानना है कि कपिल सिब्बल जाने-माने वकील और काफी अच्छे वक्ता हैं. उनका एक स्वतंत्र सदस्य के तौर पर राज्यसभा में जाना लोकतंत्र और लोकंतंत्र में बहस के लिए अच्छा साबित होगा. कांग्रेस को इस बात पर गहन चिंतन करना होगा कि जब भी किसी पार्टी, संस्था या देश से टैलेंट का निकलना शुरू हो जाता है तो ये खतरे की घंटी होती है. जेएमएम या समाजवादी पार्टी के समर्थन से सिब्बल झारखंड या उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुने जा सकते हैं.

2016 में, वह तत्कालीन सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में यूपी से राज्यसभा के लिए चुने गए थे, लेकिन अब राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास केवल 2 विधायक हैं, इसलिए वह किसी को भी चुनने की स्थिति में नहीं है.यूपी में, जहां 11 सीटों के लिए चुनाव होने हैं, भाजपा सात और समाजवादी पार्टी तीन जीत सकती है और बाद वाले के पास अभी-भी 20 वोट होंगे. हालांकि, 11वीं सीट के लिए एक समस्या खड़ी हो जाएगी, अगर भाजपा अपना आठवां उम्मीदवार उतारती है, जिसके लिए चुनाव की आवश्यकता होगी और यहीं पर अतिरिक्त वोट महत्वपूर्ण होंगे. कुल मिलाकर कांग्रेस छोड़कर बतौर निदर्लीय कपिल सिब्बल का राज्यसभा सांसद के तौर पर खड़ा होना उनकी प्रगति नहीं बल्कि अवनति ही मानी जाएगी.—दैनिक हाक फीचर्स 

*वरिष्ठ पत्रकार



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