तनवीर जाफ़री


                                             इस्लाम धर्म में रमज़ान के महीने को ख़ास इबादत और तपस्या के महीने के रूप में देखा जाता है। रमज़ान में ब्रह्म मुहूर्त काल से लेकर सूर्यास्त के समय तक केवल भूखे प्यासे रहकर कठिन ''उपवास' ही नहीं रखा जाता बल्कि नियमित रूप से नमाज़ें भी अदा की जाती और क़ुरान शरीफ़ की तिलावत भी की जाती है। माह-ए-रमज़ान में कई विशेष तिथियां भी ऐसी हैं जिनमें रोज़दार सारी सारी रात ख़ुदा की इबादत करते हैं,क़ुरान शरीफ़ व नमाज़ें पढ़ते व आमाल आदि करते हैं। इसी माह के अंत में रमज़ान में ज़कात और फ़ितरा (दान ) आदि भी निकाला जाता है। और इन सबसे बड़ी बात यह कि इतने कठिन उपवास के साथ साथ एक सच्चा रोज़दार स्वयं को दुनिया की हर प्रकार की बुराइयों से स्वयं को दूर रखने की कोशिश करता है। यहाँ तक कि दिमाग़ में किसी प्रकार के बुरे विचार आने से भी रोज़ा 'अपूर्ण ' माना जाता है। अल्लाह व ईश्वर की इस तपस्या पूर्ण आराधना के एक माह सफलता पूर्वक गुज़र जाने के बाद ही ईद का त्यौहार मनाया जाता है।

                                            इस्लाम के अनुयायियों की 30 दिन तक रोज़ा रखने की इस तपस्या से अन्य धर्मों के लोग भी बहुत प्रभावित होते हैं। हमारे देश में ऐसी सैकड़ों मिसालें मौजूद हैं कि ग़ैर मुस्लिमों विशेषकर अनेक हिन्दू भाइयों द्वारा भी रमज़ान में रोज़े रखे जाते हैं। भारतवर्ष में अनेक शिक्षित व अधिकारी स्तर के हिन्दू पुरुष व महिला रोज़ा रखते दिखाई दिये हैं । पूरे देश में ऐसे तो लाखों उदाहरण हैं जबकि ग़ैर मुस्लिम भाइयों द्वारा अथवा राजनैतिक व सामाजिक संगठनों द्वारा रमज़ान के दिनों में रोज़दारों को रोज़ा खोलने अर्थात 'इफ़्तार ' करने की दावत दी जाती है।राष्ट्रपति भवन,प्रधानमंत्री निवास से लेकर अनेक मुख्यमंत्री,राजयपाल,मंत्री,सांसद विधायक तथा विभिन्न राजनैतिक दलों के मुख्यालयों पर भी रोज़ा इफ़्तार के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं। वर्तमान दौर में देश के साम्प्रदायिक विद्वेषपूर्ण वातावरण के बीच पिछले दिनों कश्मीर के कई वीडीओ व फ़ोटो वायरल हुये जिनमें भारतीय सेना द्वारा न केवल लोगों को इफ़्तार की दावत दी गयी बल्कि अनेक हिन्दू व सिख उच्च सैन्य अधिकारी मुसलमानों के साथ बाक़ायदा नमाज़ अदा करते भी देखे गये। इस चित्र ने देश और दुनिया को यह संदेश दिया कि राजनैतिक दल अपनी सत्ता के लिये समाज को चाहे जितना विभाजित करें,जितना चाहे सांप्रदायिक दुर्भावना व विद्वेष फैलायें परन्तु इन तमाम कोशिशों के बावजूद भारतीय सेना हमेशा की तरह धर्मनिरपेक्ष थी,है और रहेगी।

                   परन्तु इसी 'इफ़्तार पार्टी ' का एक दूसरा पहलू भी है। जहाँ यही इफ़्तार पार्टियां धार्मिक सद्भाव,सांप्रदायिक एकता व रोज़दारों की तपस्या व गहन श्रद्धा को सम्मान दिये जाने का एक सशक्त माध्यम हुआ करती थीं वहीं इन इफ़्तार पार्टियों पर अब पूरी तरह सियासी रंग चढ़ चुका है। अब जहाँ देश में वाम व मध्य विचार धारा के लोग इफ़्तार पार्टियों का आयोजन इसलिये करते हैं ताकि वे मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें वहीँ दक्षिण पंथी स्वयं को इस तरह के आयोजन से दूर रखने की कोशिश करते हैं ताकि वे स्वयं को कथित 'तुष्टीकरण ' जैसे आरोपों से दूर रख सकें साथ ही अपनी इसी कट्टरवादिता का सुबूत देकर बहुसंख्य समाज को ख़ुश रखने की कोशिश भी कर सकें। परन्तु यही दक्षिणपंथी बिहार व तेलंगाना जैसे कई स्थानों पर इफ़्तार पार्टियों का आयोजन करते व इसमें शरीक होते भी दिखाई दे जाते हैं। यानी जैसा देश वैसा वेश। कुछ उसी तरह जैसे गऊ संरक्षण क़ानून उत्तर प्रदेश हरियाणा मध्य प्रदेश आदि राज्यों के लिये तो कुछ और तो केरल,गोवा,तथा पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों के लिये कुछ और।

                   बहरहाल, इस तरह के 'राजनैतिक इफ़्तार आयोजन ' में जहां तरह तरह के पकवान परोसे जाते हैं और अनेक वी वी आई पी व माननीय शिरकत करते हैं। इनमें टी वी कैमरों की ज़बरदस्त चकाचौंध दिखाई देती है वहीं ऐसी इफ़्तार पार्टियों में अतिथियों विशेषकर ग़ैर मुस्लिम अतिथियों के सिर पर टोपी रखने व उनके गले में अरबी शैली का विशेष रुमाला अथवा स्कार्फ़ डालने का चलन भी देखा गया है। बेशक यह 'टोपी बाज़ी ' साम्प्रदायिक सद्भाव की पहचान क्यों न हो परन्तु यह वही टोपी भी है जिसे 2011 में नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मेंहदी हसन नामक एक मुस्लिम इमाम के हाथों अपने सिर पर रखने से इनकार कर दिया था। ग़ौरतलब है कि 2002 के राज्य व्यापी गुजरात दंगों के बाद राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद मोदी ने 2011 में पूरे राज्य में सामाजिक सद्भावना कार्यक्रम शुरू किया था। इस कार्यक्रम में अहमदाबाद ज़िले के पीराणा गांव में इमाम मेंहदी हसन ने जब एक सार्वजनिक सभा में अपनी जेब से एक टोपी निकाल कर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पहनाने की कोशिश की तो उन्होंने वह टोपी पहनने से साफ़ मना कर दिया। जबकि मोदी दूसरे धर्मों के प्रतीक चिन्हों को चाहे सिख समुदाय की पगड़ी या रुमाला हो या फिर इज़राइल में यहुदी समुदाय की परंपरागत टोपी वे इन सभी को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जब मगहर स्थित संत कबीर की मज़ार पर पहुंचे तो वहां मौजूद ख़ादिम ने योगी को भी 'टोपी पहनाने' की कोशिश की परन्तु उन्होंने भी टोपी पहनने से इनकार कर दिया। 

                                     इन घटनाओं के बाद कम से कम उन मुसलमानों को तो ज़रूर अपनी आँखें खोलनी चाहिये जो 'टोपीबाज़ी' और रुमाला या स्कार्फ़ आदि को भी इफ़्तार पार्टी का एक हिस्सा समझते हैं ? इसी से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह भी कि जिस तरह 'राजनैतिक इफ़्तार पार्टियों' के आयोजन में टोपी-स्कार्फ़ का प्रदर्शन व इन्हें धारण करते हुये फ़ोटो सेशन होते हैं क्या ठीक उसी तरह हिन्दू त्योहारों में भी 'यही इफ़्तारी मुसलमान ' अपने माथे पर तिलक लगाना व गले में रामनामा डालना पसंद करेंगे ? देश में धार्मिक सद्भाव व सांप्रदायिक एकता का तो यही तक़ाज़ा है कि यदि आप दूसरे धर्म के लोगों को इस्लामी निशानी के रूप में 'टोपी ' व स्कार्फ़ पहनाकर संतुष्ट होते हैं और इसे सहर्ष धारण व स्वीकार करने वाले ग़ैर मुस्लिम भाइयों को उदारवादी व धर्मनिरपेक्ष मानते हैं तो मुसलमानों को भी तो अपनी उदारता व धर्मनिरपेक्षता का सुबूत देना चाहिये ? और यदि ऐसी राजनैतिक इफ़्तार पार्टी का आयोजन करने व इसमें शिरकत करने वाले मुसलमान तिलक लगाने व राम नामा गले में डालने से परहेज़ करते हैं तो उन्हें भी किसी ग़ैर मुस्लिम को न तो टोपी पहनानी चाहिये न ही अरबी रुमाला या स्कार्फ़ गले में डालना चाहिये। अधिक से अधिक इफ़्तार पार्टी आयोजन स्थल के प्रवेश द्वार पर सिर ढकने की ग़रज़ से टोपी अथवा रुमाल रख देना चाहिये ताकि स्वेच्छा से यदि कोई इनका इस्तेमाल करना चाहे तो कर सके। वैसे भी इन प्रतीकों का इस्लाम धर्म से कोई लेना देना नहीं है। बजाये इसके देश में साम्प्रदायिक सद्भाव के इच्छुक मुसलमानों को किसी राजनैतिक दल अथवा नेता की इफ़्तार पार्टी के आयोजन की प्रतीक्षा करने अथवा किसने इफ़्तार पार्टी दी और किसने नहीं दी,इन पचड़ों में पड़ने के बजाये भारतीय सैन्य अधिकारियों से सबक़ लेते हुये स्वयं पूरे देश में दीपावली व होली मिलन जैसे कार्यक्रम बढ़चढ़कर आयोजित करने चाहिये। दशहरा दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना चाहिये। सिर्फ़ इफ़्तार व टोपीबाज़ी में सद्भावना की तलाश करना ग़ैर मुनासिब है। 



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