डाॅ. वेदप्रताप वैदिक

सोनिया गांधी और राहुल गांधी आजकल ‘नेशनल हेराल्ड’ घोटाले में बुरी तरह से फंस गए हैं। मोदी सरकार उन्हें फंसाने में कोई कसर छोड़ नहीं रही है। वे दावा कर रहे हैं कि वे साफ-सुथरे हैं। यदि यह दावा ठीक है तो वे डरे हुए किस बात से हैं? जांच चलने दें। दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप हो जाएगा। वे खरे तो उतरेंगे ही। सरकार की इज्जत पैदें में बैठ जाएगी लेकिन ऐसा लगता है कि दाल में कुछ काला है। इसीलिए आए दिन धुआंधार प्रदर्शन हो रहे हैं। दर्जनों कांग्रेसी सांसद और सैकड़ों कार्यकर्ता हिरासत में जाने को तैयार बैठे रहते हैं। अब उन्होंने अपने नेताओं को बचाने के लिए नया शोशा छोड़ दिया है। मंहगाई, बेरोजगारी और जीएसटी का। इनके कारण जनता परेशान तो है लेकिन फिर भी वह कांग्रेस का साथ क्यों नहीं दे रही है? देश के लोग हजारों-लाखों की संख्या में इन प्रदर्शनों में शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं? इन प्रदर्शनों के दौरान राहुल गांधी के बयानों में थोड़ी-बहुत सत्यता होते हुए भी उन्हें कहने का तरीका ऐसा है कि वे हास्यास्पद लगने लगते हैं। जैसे राहुल का यह कहना कि भारत में लोकतंत्र की हत्या हो गई है। वह भूतकाल का विषय बन गया है। राहुल को आपात्काल की शायद कोई भी याद नहीं है। राहुल को मोदी-शासन शुद्ध तानाशाही लग रहा है। क्यों नहीं लगेगा? कांग्रेस को मोदी ने मां-बेटा पार्टी में सीमित कर दिया है। इस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की साख निरंतर घटती चली जा रही है। यदि कांग्रेसी नेता अब कोई सही बात भी बोलें तो भी लोग उस पर भरोसा कम ही करते हैं। जहां तक लोकतंत्र का सवाल है, जब कांग्रेस पार्टी जैसी महान पार्टी ही प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है तो भाजपा की क्या बिसात है कि वह लोकतांत्रिक पार्टी होने का आदर्श उपस्थित करे? हमारे देश की लगभग सभी प्रांतीय पार्टियां उनके नेताओं की जेबी पुड़िया बन गई हैं। भाजपा के राज में लगभग सभी पार्टियों का आंतरिक लोकतंत्र तो हवा हो ही गया है, अब पत्रकारिता याने खबरपालिका भी लंगड़ी होती जा रही है। लोकतंत्र के इस चौथे खंभे में अब दीमक बढ़ती जा रही है। प्रधानमंत्री की पत्रकार-परिषद का रिवाज खत्म हो गया है। सरकार का मुंह खुला है और कान बंद है। संसद के सेंट्रल हाल में अब पत्रकारों का प्रवेश वर्जित है। वहां बैठकर देश के बड़े-बड़े नेता पत्रकारों से खुलकर व्यक्तिगत संवाद करते थे। पत्रकारों को अब प्रधानमंत्री की विदेश-यात्राओं में साथ ले जाने का रिवाज भी खत्म हो गया है। ‘महिला पत्रकार क्लब’ से अब सरकारी बंगला भी खाली करवाया जा रहा है। कई अखबारों को सरकारी विज्ञापन मिलने भी बंद हो गए हैं। हमारे सभी टीवी चैनल, एक-दो अपवादों को छोड़कर, बातूनी अखाड़े बन गए हैं, जिनमें पार्टी-प्रवक्ता खम ठोकने और दंड पेलने के अलावा क्या करते है? कई अखबार और चैनल-मालिकों के यहां छापे मारकर उन्हें भी ठंडा करने की कोशिश जारी है। हमारे विरोधी दलों ने संसद की जो दुगर्ति कर रखी है, वह भी देखने लायक है। दूसरे शब्दों में जिस देश की खबरपालिका और विधानपालिका लड़खड़ाने लगे, उसकी कार्यपालिका और न्यायपालिका से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।

—दैनिक हाक







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