Chandipur Assembly Seat : टीएमसी का अभेद्य किला चांदीपुर, 2026 में भाजपा की सेंधमारी से बचना 'मुश्किल'

चांदीपुर में 2024 की बढ़त से बदला सियासी गणित, 2026 पर सबकी नजर
बंगाल चुनाव: टीएमसी का अभेद्य किला चांदीपुर, 2026 में भाजपा की सेंधमारी से बचना 'मुश्किल'

कोलकाता: पूर्व मेदिनीपुर जिले के तमलुक उपखंड का चांदीपुर ब्लॉक-स्तरीय कस्बा पश्चिम बंगाल की सियासत की एक 'थ्रिलर फिल्म' बन चुका है। क्योंकि इस सीट से सिनेमाई पर्दे के सुपरस्टार विधायक सोहम चक्रवर्ती हैं।

चांदीपुर इलाका निचले भारत-गंगा के मैदानी और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में आता है। यहां का परिदृश्य पूरी तरह से ग्रामीण है, जो जिला नदी नेटवर्क और बंगाल की खाड़ी से निकटता के कारण अक्सर बाढ़ की चपेट में रहता है। हल्दी, रूपनारायण, रसूलपुर, केलेघाई और बागुई जैसी नदियां उत्तर से दक्षिण या दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हैं। ये नदियां जहां एक तरफ खेतों की प्यास बुझाती हैं और उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी लाती हैं, वहीं दूसरी तरफ हर साल मौसमी बाढ़ का दर्द भी दे जाती हैं।

चांदीपुर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से खेती-किसानी और मछली पालन पर टिकी है। खेतों में धान, आलू, तिलहन, दालें, सब्जियां और मशहूर पान के पत्ते उगाए जाते हैं। ज्यादातर गांवों में बिजली और पीने का पानी तो पहुंच गया है, लेकिन पक्की सड़कों, परिवहन और बैंकिंग सुविधाओं के मामले में चांदीपुर आज भी मीलों पीछे है। यहां से जिला मुख्यालय तमलुक 25 से 27 किलोमीटर दूर है और यही सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भी है, जहां से हावड़ा-खड़गपुर लाइन के जरिए कोलकाता का सफर तय होता है। आसपास के अन्य कस्बों में भगवानपुर, हल्दिया, एगरा, और कांथी शामिल हैं, लेकिन ग्रामीण चांदीपुर के लिए रोजमर्रा का सफर आज भी एक चुनौती है।

राजनीतिक नक्शे पर चांदीपुर विधानसभा सीट (कांथी लोकसभा का हिस्सा) 2011 में वजूद में आई। अस्तित्व में आते ही यह सीट तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का अभेद्य किला बन गई। 2011 के पहले चुनाव में टीएमसी के अमिय कांति भट्टाचार्य ने सीपीएम (सीपीआई-एम) के विद्युत गुछैत को 11,709 वोटों से करारी शिकस्त दी। 2016 में भी अमिय कांति ने अपना परचम लहराया और मंगल चंद प्रधान को 9,654 वोटों से हराया।

लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। 2021 आते-आते चांदीपुर की हवा का रुख बदलने लगा। जो वामदल कभी टीएमसी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे, वे हाशिए पर चले गए और उनकी जगह भाजपा ने ले ली। 2011 में महज 2.98 प्रतिशत और 2016 में 5.14 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा 2021 में एक बड़ी लहर बनकर उभरी। टीएमसी ने सत्ता विरोधी लहर को भांपते हुए एक बड़ा दांव खेला। पार्टी ने अपने दो बार के विधायक अमिय कांति का टिकट काट दिया और उनकी जगह मशहूर बंगाली फिल्म और टीवी स्टार सोहम चक्रवर्ती को चुनावी मैदान में उतार दिया। यह 'मास्टरस्ट्रोक' काम कर गया। सोहम की लोकप्रियता ने भाजपा के बढ़ते कदम रोक दिए। सोहम ने भाजपा के गजाकांत गुड़िया को 13,472 वोटों के अंतर से हरा दिया। वहीं, 2011 में 44.05 प्रतिशत वोट पाने वाली सीपीआई (एम) सिकुड़कर मात्र 4.47 प्रतिशत पर आ गई।

असली 'ट्विस्ट' तो कांथी लोकसभा चुनाव के दौरान चांदीपुर विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों में देखने को मिला। 2014 में टीएमसी ने यहां से सीपीआई (एम) पर 25,540 वोटों की लीड ली थी। 2019 में जब भाजपा ने सीपीआई (एम) को दूसरे नंबर से धकेला, तब टीएमसी की बढ़त घटकर 15,463 वोट रह गई थी।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में चांदीपुर में वो हुआ, जिसे कुछ साल पहले तक 'असंभव' माना जाता था। भाजपा ने इस टीएमसी के गढ़ में 842 वोटों की एक प्रतीकात्मक, लेकिन बेहद मारक बढ़त हासिल कर ली। इस छोटी सी लीड ने पूरे इलाके में एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश भेजा कि जीत के करीब जाकर भी पार्टियां हार का सामना कर सकती हैं।

चांदीपुर के मतदाता बेहद जागरूक हैं। यहां 2011 में 91.77 प्रतिशत वोटिंग हुई थी और 2024 में भी यह आंकड़ा 86.20 प्रतिशत रहा। यहां किसी एक जाति या धर्म का एकतरफा दबदबा नहीं है।

क्या टीएमसी का फिल्मी दांव इस बार भी काम आएगा, या फिर भाजपा 2024 की लोकसभा वाली अपनी छोटी सी लीड को 2026 के विधानसभा में एक बड़ी जीत में तब्दील करेगी? यह तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।

--आईएएनएस

 

 

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