नई दिल्ली, 3 जून (आईएएनएस)। भारत के सबसे सफल पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों में शुमार प्रमोद भगत ने पुरुष एकल एसएल3 वर्ग में कई अंतरराष्ट्रीय खिताब जिताए हैं। प्रमोद भगत की मेहनत, अनुशासन और लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन ने उन्हें विश्व स्तर पर सम्मान दिलाया, जिसने खिलाड़ियों को प्रेरित किया है।
4 जून 1988 को जन्मे प्रमोद मूलत: बिहार से हैं, लेकिन परिवार ओडिशा के बरगढ़ जिले के अट्टाबीरा में रहता है। जब प्रमोद महज 5 साल के थे, तो उन्हें पोलियो हो गया, जिससे बाएं पैर में दिव्यांगता आ गई। हालांकि, इसे प्रमोद ने अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
प्रमोद के पिता रामा भगत गांव में खेती करते थे। प्रमोद की बुआ किशनु देवी को संतान नहीं थी, उन्होंने प्रमोद को गोद ले लिया और बेहतर इलाज के लिए प्रमोद को अपने साथ ओडिशा ले आईं।
प्रमोद ने ओडिशा से ही अपनी पढ़ाई की। इंटर के बाद आईटीआई किया। प्रमोद को पढ़ाई के साथ खेल में भी दिलचस्पी थी। 13 साल की उम्र में प्रमोद एक बैडमिंटन मैच देखने गए, जिसके बाद इस खेल में रुचि गहरी हो गई। प्रमोद कई-कई घंटों तक बैडमिंटन का अभ्यास करने लगे।
महज 15 साल की उम्र में प्रमोद ने सामान्य श्रेणी के खिलाड़ियों के खिलाफ अपना पहला टूर्नामेंट खेला, जिसमें शानदार प्रदर्शन करते हुए पहली बार जिला चैंपियन का खिताब जीता।
साल 2009 में प्रमोद ने वर्ल्ड चैंपियनशिप के मेंस सिंगल्स में गोल्ड जीता। इसके बाद साल 2013, 2015, 2019, 2022, 2024 और 2026 में भी गोल्ड जीते। साल 2018 और 2022 के एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड जीतने वाले प्रमोद ने 2020 टोक्यो पैरालंपिक गेम्स के मेंस सिंगल्स इवेंट में देश के लिए गोल्ड जीता।
खेल में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रमोद भगत को साल 2019 में 'अर्जुन अवॉर्ड' से नवाजा गया, जिसके बाद साल 2021 में 'मेजर ध्यान चंद खेल रत्न पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। साल 2022 में प्रमोद 'पद्म श्री' से सम्मानित हुए।
प्रमोद भगत अपने संघर्ष, अनुशासन और उपलब्धियों के कारण खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। शारीरिक चुनौती के बावजूद उन्होंने कड़ी मेहनत से वर्ल्ड चैंपियन और पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट बनने का गौरव हासिल किया। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।