खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स: मां और एथलीट के बीच का संघर्ष, पल्लवी पायेंग की कहानी है प्रेरणादायी

रायपुर, 30 मार्च (आईएएनएस)। किसी भी मां के लिए उसके बच्चे से दूर होना सबसे मुश्किल होता है, लेकिन कभी-कभी जिंदगी में ऐसे मौके आते हैं जब हमें ये फैसला लेना पड़ता है और इस त्याग का परिणाम हक में आने पर ऐसी कहानियां मिसाल बन जाती हैं। ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ में हिस्सा लेने वाली असम की पल्लवी पायेंग की कहानी कुछ ऐसी ही है।

मिसिंग जनजाति से आने वाली वेटलिफ्टर पल्लवी पायेंग ने ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ में महिलाओं की 69 किलोग्राम श्रेणी में रजत पदक जीतकर त्याग, संघर्ष और दृढ़ संकल्प की मिसाल पेश की है।

पल्लवी के लिए यह सफर आसान नहीं रहा। जब उनकी बेटी सिर्फ छह महीने की थी, तब उन्हें एक कठिन फैसला लेना पड़ा। उन्हें वेटलिफ्टिंग या फिर अपनी 6 महीने की बेटी में किसी एक को चुनना था। पल्लवी ने दिल पर पत्थर रखकर वेटलिफ्टिंग को चुना। इस फैसले में उनके परिवार का अहम योगदान रहा। उनके पति सुखावन थौवमुंग ने उनका पूरा साथ दिया, जबकि उनकी मां ने बच्ची की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली।

पल्लवी ने साई मीडिया से बात करते बताया, "ट्रेनिंग पर वापस लौटने के लिए मैंने अपनी बच्ची को तब छोड़ दिया था, जब वह सिर्फ छह महीने की थी। यह एक बेहद भावुक फैसला था, लेकिन मुझे लगा कि खेल में दोबारा वापसी करने के लिए यही सबसे सही समय है।"

उन्होंने कहा, "मेरे पति ने हर कदम पर मेरा पूरा साथ दिया है, और जब भी मैं किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए बाहर जाती हूं, तो मेरी मां यह सुनिश्चित करती हैं कि मेरी बच्ची की देखभाल में कोई कमी न रह जाए।"

पल्लवी के पति राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज रह चुके हैं। वह सीमा सुरक्षा बल में ड्राइवर के पद पर कार्यरत हैं और फिलहाल जम्मू में तैनात हैं।

2018 में वेटलिफ्टिंग शुरू करने वाली पल्लवी ने राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाई, लेकिन कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उनका करियर ठहर सा गया। इसी बीच वह मां बनीं, जिससे खेल में वापसी और भी चुनौतीपूर्ण हो गई।

बच्चे के जन्म के बाद खेल में वापसी का उनका पहला प्रयास 2023 में गोलाघाट राज्य चैंपियनशिप में हुआ, जहां वह छठे स्थान पर रहीं। 2024 में डिब्रूगढ़ में भी उन्हें निराशा हाथ लगी। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी।

2025 उनके करियर के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। तेजपुर राज्य चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता और फिर अस्मिता लीग में लगातार दो स्वर्ण पदक हासिल किए। इन उपलब्धियों ने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी।

रायपुर में ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ में मिला रजत पदक उनके करियर का एक अहम मोड़ साबित हुआ। पल्लवी के मुताबिक, इस उपलब्धि ने उन्हें यह विश्वास दिलाया है कि वह बड़े मंच पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं।

आज उनकी बेटी चार साल की हो चुकी है और पल्लवी अपने खेल और परिवार के बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ रही हैं। उनकी कहानी उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।

--आईएएनएस

पीएके

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