1 अप्रैल को जन्मे दो दिग्गज भारतीय, खेल जगत में किया नाम रोशन

नई दिल्ली, 31 मार्च (आईएएनएस)। भारतीय खेल जगत के लिए '1 अप्रैल' का दिन बेहद खास है। इसी दिन 2 ऐसी हस्तियों का जन्म हुआ, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया। आइए, इनके बारे में जानते हैं।

फौजा सिंह: 1 अप्रैल 1911 को पंजाब के जालंधर में एक बच्चे का जन्म हुआ। किसान परिवार में यह बालक चार बच्चों में सबसे छोटा था, जिसका नाम रखा गया फौजा सिंह। पांच साल की उम्र तक फौजा चलने में सक्षम नहीं थे, पैर बेहद कमजोर थे, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों का डटकर सामना किया।

परिवार को समर्थन देने के लिए फौजा सिंह ने खेती शुरू की। साल 1992 में फौजा सिंह अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बेटे के साथ लंदन में बस गए। साल 1994 में जब उनके पांचवें बेटे कुलदीप की मृत्यु हुई, तो इस दुख को दूर करने के लिए उन्होंने टहलना शुरू किया और धीरे-धीरे यह चहलकदमी दौड़ में बदल गई।

साल 2000 तक फौजा सिंह ने दौड़ को गंभीरता से नहीं लिया था। 89 साल की उम्र में उन्होंने 6 घंटे 54 मिनट में फुल मैराथन को पूरा किया। साल 2003 में टोरंटो वाटरफ्रंट मैराथन में '90 से अधिक' श्रेणी में पांच घंटे 40 मिनट में दौड़ पूरी की।

'टरबैन्ड टोर्नेडो' के नाम से मशहूर फौजा सिंह ने साल 2011 में 100 वर्ष की उम्र में कनाडा के टोरंटो के बिर्चमाउंट स्टेडियम में विशेष ओंटारियो मास्टर्स एसोसिएशन आमंत्रण मीट में एक ही दिन में आठ विश्व आयु समूह रिकॉर्ड बनाए।

फौजा सिंह ने 100 मीटर दौड़ 23.14, 200 मीटर दौड़ 52.23, जबकि 400 मीटर दौड़ 2:13.48 में पूरी की। इसके अलावा, 800 मीटर दौड़ 5:32.18 और 1500 मीटर दौड़ 11:27.81 में पूरी की। एक मील दौड़ 11:53.45, 3000 मीटर दौड़ 24:52.47 और 5000 मीटर दौड़ 49:57.39 समय में पूरी की।

फौजा सिंह लंदन 2012 ओलंपिक के लिए एक टॉर्च बियरर रहे, उन पर 'टरबैन्ड टोर्नेडो' नामक एक किताब लिखी गई। 14 जुलाई 2025 को 114 साल की उम्र में फौजा सिंह एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए, जिसमें उनका निधन हो गया।

वीरेंद्र सिंह उर्फ गूंगा पहलवान: 1 अप्रैल 1986 को हरियाणा के भिवानी में जन्मे वीरेंद्र सिंह ने मूक-बधिर होने के बावजूद कभी हार नहीं मानी। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले वीरेंद्र के पिता अजीत सीआईएसएफ जवान थे। उन्हें कुश्ती की प्रेरणा अपने पिता और चाचा से मिली। पहलवानी की परंपरा परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही थी।

मूक-बधिर होने के चलते बचपन में वीरेंद्र सिंह को काफी तंग किया जाता था। 9 साल की उम्र में चाचा उन्हें दिल्ली ले आए। चाचा और पिता को कुश्ती करते देखकर वीरेंद्र सिंह ने भी कुश्ती के अखाड़े में उतरने का मन बना लिया। उन्होंने छत्रसाल स्टेडियम और गुरु हनुमान अखाड़े से कुश्ती का प्रशिक्षण लिया।

वीरेंद्र को पहली सफलता 2002 में विश्व कैडेट कुश्ती चैंपियनशिप के राष्ट्रीय दौर में मिली, जहां उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने साल 2005, 2013 और 2017 में डेफलिम्पिक्स में तीन गोल्ड जीते। साल 2009 के डेफलिम्पिक्स में उनके नाम एक ब्रॉन्ज मेडल रहा। साल 2016 में उनके नाम वर्ल्ड डेफ रेसलिंग चैंपियनशिप का खिताब रहा।

'गूंगा पहलवान' के नाम से मशहूर वीरेंद्र सिंह को साल 2015 में 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। साल 2021 में उन्हें 'पद्मश्री पुरस्कार' से नवाजा गया।

--आईएएनएस

आरएसजजी

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