कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी रहीं तो पेट्रोल-डीजल और महंगे हो सकते हैं: एचएसबीसी की प्रांजुल भंडारी

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी रहीं तो पेट्रोल-डीजल और महंगे हो सकते हैं: एचएसबीसी की प्रांजुल भंडारी

नई दिल्ली, 9 जून (आईएएनएस)। एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने मंगलवार को कहा कि अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और भारत का तेल आयात बिल लगातार बढ़ता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी की जा सकती है।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में भंडारी ने कहा कि हाल के महीनों में भारत में आयातित कच्चे तेल की वास्तविक लागत (लैंडेड कॉस्ट) करीब 110 डॉलर प्रति बैरल रही है। उनके अनुसार, इस स्तर पर तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर भारी वित्तीय दबाव पड़ रहा है।

उन्होंने कहा, "पिछले एक महीने में भारत में तेल आयात की लागत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल रही है। इन स्तरों पर तेल वितरण कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकार ने इस बोझ का बड़ा हिस्सा अपने ऊपर लिया है और तेल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती की है।"

भंडारी ने कहा कि तेल की ऊंची वैश्विक कीमतों का पूरा बोझ केवल सरकार नहीं उठा सकती और इसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं को भी वहन करना होगा।

उन्होंने कहा, "इस बोझ का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं को भी उठाना चाहिए। खुदरा ईंधन कीमतों में पहले ही 7.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन मुझे लगता है कि इसमें थोड़ी और बढ़ोतरी की जा सकती है।"

उन्होंने आगे कहा कि उनकी राय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10 से 12 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी उचित होती, क्योंकि इससे वैश्विक तेल कीमतों के झटके का बोझ सरकार और उपभोक्ताओं के बीच अधिक संतुलित तरीके से बंटता।

प्रांजुल भंडारी ने संकेत दिया कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, "अगर यह संकट जारी रहता है और भारत का आयातित तेल बिल इसी तरह ऊंचा बना रहता है, तो यहां से ईंधन कीमतों में कुछ और बढ़ोतरी संभव है।"

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक कच्चे तेल बाजार में लगातार अस्थिरता बनी हुई है और इससे ऊर्जा आयात की लागत पर दबाव बढ़ रहा है।

इस सप्ताह की शुरुआत में सरकार ने भी बताया था कि देश की तेल विपणन कंपनियां अभी भी भारी वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 600 से 700 करोड़ रुपए का अंडर-रिकवरी (कम वसूली) नुकसान हो रहा है, जिसमें एलपीजी बिक्री पर होने वाला घाटा भी शामिल है।

राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रवीण खन्नूजा ने कहा कि यह नुकसान मुख्य रूप से खुदरा बिक्री कीमतों और अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों के बीच बढ़ते अंतर के कारण हो रहा है।

उनके अनुसार, वैश्विक बाजार में ईंधन की ऊंची कीमतों और घरेलू स्तर पर नियंत्रित खुदरा कीमतों के चलते तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ रहा है।

--आईएएनएस

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