
जितना गौरवपूर्ण मन्दिर का स्वरूप और निर्माण था उतना ही उद्घाटन, प्राण-प्रतिष्ठा के लिये भी वैसे ही लब्ध-प्रतिष्ठित उद्घाटनकर्ता का विचार आना स्वाभाविक ही था।
जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती के कर कमलों द्वारा मूर्तियों की पूर्ण वैदिक विधि से प्राण प्रतिष्ठा की गयी।
पूज्य स्वामी जी, भारत के प्रथम नागरिक होने के नाते तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी को आमन्त्रित करने उनके निवास पर दिल्ली पहुँचे। साथ में रचनात्मक समाज की अध्यक्षा सुश्री निर्मला देशपाण्डे भी थीं। प्रारम्भ में प्रधानमन्त्री ने अपनी व्यस्तता प्रकट करते हुए असहमति जताई, परन्तु स्वामी जी ने कहा कि, 'एक सन्त का दृड् संकल्प है कि, आप आएँगी।' यह सुनकर श्रीमती गाँधी ने कहा कि 'सन्त का दृड् संकल्प टाला नहीं जा सकता।' वे निश्चित समय पर पहुँची। भारत गणराज्य की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी ने भारत माता की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया और प्रथम दर्शन कर लोकार्पित किया।
इस अवसर पर आयोजित सर्वधर्म सद्भाव सम्मेलन को उद्घोषित करते हुये प्रधानमन्त्री ने श्री स्वामी जी के प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी चाहती थीं कि, स्वामी जी के व्यक्तित्त्व और प्रतिभा का उपयोग राष्ट्रहित में किया जाए।
भारत को भावात्मक-एकता और अखण्डता के लिए 'हम सब भारत वासी भारत माता की सन्तान है' भावना से अनुप्राणित होकर ‘भारतमाता' की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठता की गई। श्रद्धालु दर्शनार्थी इसी सत से भारत माता की मूर्ति का दर्शन कर अपने को अनुप्राणित कर सकते हैं, करते हैं।
माँ सदैव अपनी को सुखी-समृद्ध देखना चाहती है।
इसी उद्देश्य से वन्दे मातरम् गीत में 'सुजलाम् सुफलाम्' की भावना व्यक्त की गई।
इस प्रतिमा में आप देखते हैं कि, भारत माता के एक हाथ में दुग्ध-पात्र और दूसरे हाथ में धान की बालियाँ दिखाई गई हैं, जो श्वेत क्रान्ति और हरित क्रान्ति की निरन्तर प्रेरणा देती हैं कि, धन-धान्य से सन्तान स्वावलम्बी बनी रहे, किसी राष्ट्र की मुँहताज नहीं माँ समग्र जीवन की आधारभूत होती है, इसलिए, सात मंजिलें मन्दिर की आधार भूमि में भारत माता की प्रतिमा प्रतिष्ठा 'मातृदेवो भव' में ही है।
*भारत माता की ही प्रतिमा क्यों स्थापित की गई ?
भारत माता ही तो सम्पूर्ण राष्ट्र है। उसकी सम्पूर्ण शक्ति राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक में उद्भूत है, उस शक्ति का अनुभव करवाने के लिए सनातन धर्म में प्रतिमा अथवा मूर्ति प्रतिष्ठा का विशेष महत्व है। धन-धान्य की समृद्धि के लिए जिस प्रकार बीज बोना परमावश्यक है, उसी प्रकार, देवी और मानवीय संस्कार जाग्रत करने के लिये प्रतिमा को प्रतिष्ठा, उपासना का महत्वपूर्ण अङ्ग है। इसीलिए मूर्ति प्रतिष्ठा के अनन्तर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। प्राण प्रतिष्ठा से चैतन्य का संचार होता है। चेतना-शून्य जीव की संज्ञा मृत मानी जाती है। मूर्ति में चेतना का आभास होने से उपासक और दर्शनार्थी अपनी श्रद्धा भावनानुसार अपने भीतर वैसी चेतना की अनुभूति करता है। साधक और दर्शक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना जाग्रत कर सकें, इसलिए भारतमाता की प्रतिमा प्रतिष्ठित करने का सङ्कल्प परमात्मा ने जगाया और उसे पूरा करवाया

