आजकल प्रदेश के कई अधिकारी जनता की समस्याओं के समाधान से अधिक अपनी छवि बनाने में व्यस्त दिखाई देते हैं। कोई बैलगाड़ी पर सफर कर रहा है, कोई साइकिल चला रहा है, तो कोई पैदल मार्च कर रहा है। ऐसा लगता है कि सुर्खियों में बने रहना ही प्रशासनिक कार्यों की प्राथमिकता बन गया है।
गाजियाबाद में भी अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं, जहां अधिकारी आम लोगों के वाहन पर बैठकर यात्रा करते हुए दिखाई देते हैं। इन कार्यक्रमों के साथ फोटो और वीडियो बनाने की विशेष व्यवस्था भी रहती है। सवाल यह है कि क्या सरकारी कर्मचारियों का मुख्य कार्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन है या फिर अधिकारियों की छवि निर्माण करना?
दूसरी ओर, प्रदेश के शिक्षक लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जा रहे हैं। कभी पशुओं की गणना, कभी सर्वेक्षण और कभी अन्य प्रशासनिक कार्य। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। शिक्षा व्यवस्था पहले से कई चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे में शिक्षकों को उनके मूल कार्य से दूर करना चिंताजनक है।
हाल के दिनों में गाजियाबाद में कई दर्दनाक घटनाएं हुईं। पीड़ित परिवारों से मुलाकात हुई, आर्थिक सहायता की घोषणाएं भी की गईं। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा भी देखने को मिला कि पीड़ितों को वह ध्यान और संवेदना नहीं मिली जिसकी अपेक्षा थी। यदि किसी खिलाड़ी या आम नागरिक के साथ दुखद घटना होती है, तो उसके प्रति भी समान संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।
जनता यह जानना चाहती है कि प्रशासन की प्राथमिकता प्रचार है या समस्याओं का स्थायी समाधान? अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का मूल्यांकन उनके कार्यों से होना चाहिए, न कि केवल फोटो और वीडियो से।
आखिर कोई तो इन बातों पर गंभीरता से विचार करे और प्रशासन को उसकी मूल जिम्मेदारियों की याद दिलाए।