वॉशिंगटन, 9 जून (आईएएनएस)। ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1 बी वीजा के लिए 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगाने के फैसले को रद्द करने वाले एक संघीय न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले का मुख्य मुद्दा इमिग्रेशन नीति नहीं, बल्कि यह था कि क्या राष्ट्रपति प्रशासन ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना नया टैक्स लगा दिया था।
42 पन्नों के अपने फैसले में अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन ने कहा कि एच-1 बी नीति वास्तव में एक अनधिकृत टैक्स थी और यह राष्ट्रपति को कानून द्वारा दी गई शक्तियों से बाहर थी।
उन्होंने लिखा, "अदालत का मानना है कि यह नीति एच-1 बी याचिकाओं पर टैक्स लगाती है, जबकि इसके लिए कांग्रेस ने कोई अधिकार नहीं दिया है। एच-1 बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लगाने की अनुमति किसी कानून में नहीं है।"
ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क विदेशी नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की राष्ट्रपति की शक्ति का हिस्सा है लेकिन न्यायाधीश ने इस दलील को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जिन इमिग्रेशन कानूनों का हवाला दिया गया है, वे राष्ट्रपति को नया टैक्स लगाने का अधिकार नहीं देते।
उन्होंने लिखा, "इन कानूनों को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वे कांग्रेस की विशेष टैक्स लगाने की शक्ति राष्ट्रपति को सौंपते हों।"
फैसले में बार-बार कहा गया कि राष्ट्रपति के पास इमिग्रेशन मामलों में व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन उनकी भी संवैधानिक सीमाएं हैं।
न्यायाधीश ने कहा, "कार्यपालिका (एग्जीक्यूटिव) के पास विदेशी नागरिकों के प्रवेश और निष्कासन को लेकर व्यापक अधिकार हैं, लेकिन ये अधिकार असीमित नहीं हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियां संविधान की सीमाओं या कांग्रेस द्वारा दिए गए अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकतीं।
सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि 1 लाख डॉलर की राशि टैक्स नहीं बल्कि इमिग्रेशन प्रतिबंध का हिस्सा है।
इस पर न्यायाधीश ने साफ कहा, "टैक्स को प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता।"
फैसले में अमेरिकी संविधान का भी उल्लेख किया गया, जिसमें टैक्स लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस को दिया गया है। न्यायाधीश ने कहा कि कांग्रेस कुछ मामलों में यह अधिकार सरकारी एजेंसियों को दे सकती है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट कानूनी अनुमति होना जरूरी है।
उन्होंने पाया कि जिन इमिग्रेशन कानूनों का हवाला दिया गया, वे राष्ट्रपति को नियम, प्रतिबंध और शर्तें लगाने की अनुमति तो देते हैं, लेकिन नया टैक्स बनाने की अनुमति नहीं देते।
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस नीति को लागू करने वाली सरकारी एजेंसियां अपने कानूनी अधिकारों से आगे बढ़ गई थीं।
फैसले में कहा गया, "प्रतिवादियों (सरकारी एजेंसियों) के पास एच-1 बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लगाने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।"
संवैधानिक मुद्दों के अलावा, अदालत ने यह भी पाया कि एजेंसियों ने जरूरी नियम बनाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया और न ही यह ठीक से समझाया कि नियोक्ताओं पर इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत क्यों डाली जा रही है।
अंत में अदालत ने इस नीति को अवैध घोषित करते हुए पूरे देश में इसे रद्द कर दिया।
न्यायाधीश ने आदेश दिया, "इस घोषणा को लागू करने वाली नीति को अवैध घोषित किया जाता है और इसे पूरी तरह रद्द किया जाता है।"
--आईएएनएस
एएमटी/एएस






