रांची, 9 जून (आईएएनएस)। झारखंड हाईकोर्ट ने यौन हिंसा और दुष्कर्म पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और पुनर्वास व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को कई अहम निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और संवेदनशील तरीके से कार्रवाई सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए मंगलवार को 19 महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए। मामले में अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया एमिकस क्यूरी के रूप में उपस्थित रहे।
हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में बीएनएसएस, 2023 के प्रावधानों के तहत हर हाल में जीरो एफआईआर दर्ज की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज करने में लापरवाही बरतता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही पुलिसकर्मियों को ऐसे मामलों से संवेदनशीलता के साथ निपटने के लिए नियमित प्रशिक्षण देने को कहा गया है।
अदालत ने महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग को राज्य के सभी वन स्टॉप सेंटरों की कमियां दूर करने और वहां उपलब्ध सुविधाओं को बेहतर बनाने का निर्देश दिया है। इन केंद्रों की निगरानी के लिए महिलाओं की अध्यक्षता में समिति बनाने और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने को भी कहा गया है।
खंडपीठ ने सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में दुष्कर्म पीड़िताओं की जांच के दौरान विवादित ‘टू फिंगर टेस्ट’ पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इस निर्देश का उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दूरदराज के इलाकों की लड़कियों के बीच कानूनी जागरूकता बढ़ाने, स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में आत्मरक्षा प्रशिक्षण शुरू करने तथा जरूरत पड़ने पर पीड़िता और उसके परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था करने को भी कहा है।
इसके अलावा, अदालत ने महिला हेल्पलाइन 181 को और प्रभावी बनाने तथा इसे आपातकालीन सेवा 112 से जोड़ने की संभावना पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत का मानना है कि इससे संकट की स्थिति में महिलाओं को जल्द सहायता मिल सकेगी।