मुंबई, 6 जून (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका योगदान पर्दे पर दिखने वाली फिल्मों से कहीं बड़ा है। ख्वाजा अहमद अब्बास ऐसा ही एक नाम हैं। लेखक, निर्देशक, पत्रकार और विचारक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अब्बास ने न केवल भारतीय समानांतर सिनेमा को नई दिशा दी, बल्कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को वह कलाकार भी दिया, जिसे आज दुनिया ‘सदी का महानायक’ कहती है। यह कलाकार हैं अमिताभ बच्चन।
ख्वाजा अहमद अब्बास उन चुनिंदा फिल्मकारों में शामिल थे, जो प्रतिभा को उसके शुरुआती दौर में ही पहचानने की क्षमता रखते थे। साल 1969 में जब वह अपनी फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ के लिए नए कलाकारों की तलाश कर रहे थे, तब उनकी नजर एक लंबे, दुबले-पतले युवक पर पड़ी। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सितारा बनेगा लेकिन अब्बास ने अमिताभ बच्चन में वह संभावना देख ली थी, जो बाद में पूरी दुनिया के सामने आई।
7 जून 1914 को हरियाणा के पानीपत में जन्मे ख्वाजा अहमद अब्बास का जीवन साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा के इर्द-गिर्द घूमता रहा। शुरुआती पढ़ाई पानीपत में करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक और कानून की शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक लेखनी के जरिए पहचान बनाई।
सिनेमा की दुनिया में उनका प्रवेश 1930 के दशक में हुआ। उन्होंने शुरुआत पटकथा लेखन से की और धीरे-धीरे निर्देशन की ओर बढ़े। उनकी फिल्मों में आम लोगों के संघर्ष, सामाजिक असमानता और देश के बदलते हालात प्रमुख विषय होते थे। यही वजह थी कि उन्हें भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रदूत में से एक माना जाता है।
उनकी निर्देशित शुरुआती फिल्मों में ‘धरती के लाल’ का विशेष स्थान है। इसके बाद उन्होंने कई ऐसी फिल्में बनाईं, जिन्होंने समाज के यथार्थ को बड़े पर्दे पर उतारा। उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और इसने उन्हें एक संवेदनशील फिल्मकार के रूप में स्थापित किया।
हालांकि, उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में ‘सात हिंदुस्तानी’ का नाम सबसे ऊपर आता है। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। बाद में अमिताभ ने कई मौकों पर बताया कि मुंबई में हुई पहली मुलाकात के दौरान अब्बास ने उनसे लंबी बातचीत की थी और कुछ ही समय में उनकी क्षमता को पहचान लिया था।
अमिताभ बच्चन ने यह भी याद किया था कि फिल्म की शूटिंग के दौरान पूरी टीम एक परिवार की तरह रहती थी। सभी कलाकार एक साथ यात्रा करते, एक साथ रहते और समान सुविधाओं का इस्तेमाल करते थे। अब्बास साहब का मानना था कि कलाकार को अपने किरदार और कहानी से जुड़ने के लिए जमीन से जुड़े रहना चाहिए।
ख्वाजा अहमद अब्बास ने केवल निर्देशन ही नहीं किया बल्कि कई प्रतिष्ठित फिल्मों की पटकथा भी लिखी। राज कपूर की ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘बॉबी’ जैसी फिल्मों में उनके लेखन की गहरी छाप दिखाई देती है।
सिनेमा और समाज के प्रति उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1 जून 1987 को उनका निधन हो गया। भारतीय सिनेमा में उनका नाम हमेशा उस दूरदर्शी फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है।