Sweden Schools Books : फिल्म निर्देशक सुभाष घई ने बताया अगली पीढ़ी को बचाने का मंत्र

स्वीडन ने स्क्रीन क्लास छोड़कर किताबों से शिक्षा पर जोर दिया, सुभाष घई ने दी प्रतिक्रिया
फिल्म निर्देशक सुभाष घई ने बताया अगली पीढ़ी को बचाने का मंत्र

मुंबई: आज के समय में जब दुनिया जब एआई के पीछे भाग रही है, तो यूरोपीय देश स्वीडन ने आर्टिफिशियल टूल के इस्तेमाल के बजाय किताबों पर जोर दिया है। दरअसल, स्वीडन सरकार ने बच्चों की सेहत का खास ख्याल रखते हुए हाल ही में स्कूलों में स्क्रीन-बेस्ड क्लास की बजाय फिजिकल किताबों और पेन-पेपर से पढ़ाई शुरू करने का ऐलान किया है।

फिल्म निर्देशक सुभाष घई ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक नोट पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, "स्वीडन सरकार ने स्कूलों में स्क्रीन क्लास की जगह फिर से किताबों से पढ़ाई करवाने का फैसला किया है। क्योंकि छात्रों को अच्छे तरीके से पढ़ाई करने में दिक्कत हो रही थी। सही तरीके से पढ़ाई समझ ज्यादा स्क्रीन टाइम से ध्यान कम लगता है, लिखने की आदत कमजोर होती है, जो अगली पीढ़ी के लिए गंभीर चिंता की बात है।"

घई ने सुझाव दिया कि क्लासरूम में स्क्रीन और किताबों का संतुलित इस्तेमाल यानी हाइब्रिड तरीका अपनाया जाना चाहिए। पूरी तरह डिजिटल या पूरी तरह पुराना सिस्टम नहीं बल्कि दोनों का सही मिश्रण फायदेमंद होगा।

बता दें कि स्वीडन उन देशों में शुमार है, जहां लंबे वक्त से डिजिटल एजुकेशन कराई जा रही है। इस देश के स्कूलों में किताबों के बजाय कंप्यूटर, स्मार्ट क्लासरूम और टैबलेट जैसी चीजों के जरिए पढ़ाया जाता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि सरकार को लगता था कि स्टूडेंट जब स्कूल से निकलेंगे, तो वह टेक पर निर्भर हो चुकी दुनिया में तालमेल बैठा पाएंगे, जिसके बाद स्कूल से धीरे-धीरे किताबें स्कूलों से खत्म होने लगीं और उनकी जगह कंप्यूटर और टैबलेट ने ले ली।

हालांकि, लगातार स्क्रीन पर काम करने से बच्चों की स्वास्थ्य पर प्रभाव देखने को मिला, जिस वजह से सरकार ने इस पर रोक लगाकर किताबों के इस्तेमाल का ऐलान किया।

हालांकि, स्वीडन सरकार का यह फैसला दुनिया के लिए एक बड़ा संदेश है। एआई और डिजिटल टूल्स भले ही आगे बढ़ रहे हों, लेकिन बुनियादी शिक्षा में किताबों, लिखने और फोकस का महत्व अभी भी सबसे ज्यादा है।

--आईएएनएस

 

 

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