राजस्थान की मरू कोकिला: लोक संगीत की विशिष्ट गायन शैली 'मांड' को नई पहचान देने वाली लोक गायिका गवरी बाई

नई दिल्ली, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। राजस्थान की रेतीली धरती ने कई प्रतिभाओं को जन्म दिया, लेकिन कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो समय बीतने के बाद भी लोगों के दिल में गूंजती रहती हैं। ऐसी ही एक अमर आवाज थीं गवरी देवी, जिन्हें राजस्थान की मरू कोकिला के नाम से जाना जाता है। उन्होंने राजस्थान की पारंपरिक लोक गायन शैली मांड को नई पहचान दी और इसे देश-विदेश तक पहुंचाया।

उनकी आवाज आज भी राजस्थानी लोक संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। उन्होंने मांड शैली को नई पहचान देकर राजस्थान की लोक परंपरा की समृद्ध और भावपूर्ण झलक पूरे विश्व को दिखाई। आज जब हम राजस्थानी लोक संगीत की बात करते हैं तो गवरी देवी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। लोकसंगीत जगत में उन्हें न सिर्फ एक गायिका बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की एक जीवंत धरोहर के रूप में सम्मान दिया जाता है।

गवरी देवी का जन्म 14 अप्रैल 1920 को बीकानेर में हुआ था। उनके पिता बंशीलाल और माता जमुनादेवी दोनों ही बीकानेर दरबार के प्रसिद्ध गायक थे। संगीत का वातावरण घर में ही था, इसलिए बचपन से ही गवरी देवी की रुचि गायकी में विकसित हुई। 20 वर्ष की आयु में उनका विवाह जोधपुर के मोहनलाल गमेती से हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही पति के निधन के कारण उन्हें अकेले जीवन संघर्ष करना पड़ा। इसी समय उन्होंने संगीत को अपना सहारा बनाया और पूरी तरह से गायकी में डूब गईं।

गवरी देवी मुख्य रूप से मांड गायन शैली के लिए प्रसिद्ध हुईं। मांड राजस्थान की एक विशिष्ट और कठिन गायन शैली है, जिसमें भावपूर्ण स्वर और गहरी अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने मांड को न केवल सहेजा बल्कि इसे नई ऊंचाई भी दी। इसके अलावा वे ठुमरी, भजन और गजल गाने में भी निपुण थीं।

साल 1957 में गवरी देवी ने रेडियो और दूरदर्शन पर मांड गायकी के कार्यक्रम शुरू किए, जो बहुत लोकप्रिय हुए। वे हर साल राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित समारोहों में मांड प्रस्तुत करती थीं। उनकी ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, बंगाल, केरल, तमिलनाडु जैसे कई राज्यों में अपनी प्रस्तुतियां दीं।

साल 1983 में उन्होंने रूस की राजधानी मॉस्को में भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ में भाग लिया और ‘केसरिया बलम आवो हमारे देश’ गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके योगदान को देश और राज्य दोनों स्तर पर सम्मान मिला। वर्ष 1980 में उन्हें ‘हूज हू इन एशिया’ में शामिल किया गया। 1986 में भारत सरकार ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया, जो कलाकारों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। यह पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरामन ने प्रदान किया था।

उन्हें मरणोपरांत राजस्थान सरकार ने वर्ष 2013 में राजस्थान रत्न पुरस्कार से नवाजा। गवरी देवी का निधन 29 जून 1988 को हुआ।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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