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कोलकाता, 22 मई (आईएएनएस)। संतूर के उस्ताद और हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित पंडित तरुण भट्टाचार्य ने इस प्रतिष्ठित सम्मान को अपने जीवन का भावुक और गौरवपूर्ण क्षण बताया है। उन्होंने कहा कि पद्म पुरस्कारों का चयन बेहद सोच-समझकर किया जाता है और कई ऐसे लोगों को भी सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया हो, लेकिन उन्हें पहले कभी पहचान नहीं मिली हो। इस दौरान, उन्होंने यह भी अपील की कि बच्चों को संगीत सिखाना चाहिए, क्योंकि यह जीवन में सकारात्मकता लाता है।
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा, "पद्म श्री पुरस्कार एक बहुत ही प्रतिष्ठित सम्मान है और इसे पाने वाला हर व्यक्ति कृतज्ञ महसूस करता है। मैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करता हूं। मुझे बहुत खुशी है कि मुझे इस पुरस्कार के लिए चुना गया है। हालांकि, आज मुझे इस बात का दुख है कि मेरे माता-पिता अब जीवित नहीं हैं। मेरी शिक्षा की शुरुआत मेरे पिता से हुई थी और अगर आज वे जीवित होते, तो उन्हें बहुत खुशी होती। मैं यह उपलब्धि उन्हें समर्पित करता हूं।"
उन्होंने आगे कहा, "चयन बहुत ही समझदारी से किया जाता है। कुछ चयन ऐसे भी होते हैं जहां लोगों को कभी कोई पुरस्कार या पहचान नहीं मिलती, भले ही उन्होंने समाज के लिए बहुत योगदान दिया हो। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि चयन कैसे किया जाता है, लेकिन पुरस्कार बहुत सोच-समझकर दिए जाते हैं। इनमें उन लोगों को भी शामिल किया जाता है जिनके लिए शायद कोई सिफारिश न हो। मेरे मामले में, मेरा चयन संतूर वादन के लिए हुआ था। संतूर के क्षेत्र में अब ज्यादा वरिष्ठ कलाकार नहीं बचे हैं, क्योंकि पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी का निधन हो चुका है। इसलिए, इस क्षेत्र में मैं वरिष्ठ स्तर के कलाकारों में से एक था। इस कारण मेरा चयन हुआ है।"
इस दौरान, पंडित तरुण भट्टाचार्य ने अपना एक किस्सा भी शेयर किया। उन्होंने बताया, "यह एक बहुत ही दिल को छू लेने वाला अनुभव था। मुझे एक घटना याद है जब हम पहली बार कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम गए थे। मेरे साथ पद्म भूषण से सम्मानित और ग्रैमी विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित दया शंकर भी थे। गुरुजी, पंडित रविशंकर ने कहा था कि हमें दो घंटे तक प्रस्तुति देनी चाहिए। हालांकि, हमने प्रस्तुति को एक-एक घंटे के दो हिस्सों में बांट लिया और उसी के अनुसार प्रस्तुति दी। इसके बाद, दर्शकों ने खड़े होकर हमारी सराहना की। लगभग ढाई हजार लोग वहां थे। हमें पहले लगा था कि इनको संगीत अच्छा लगा है, लेकिन वे घर जाने के लिए भी तैयार हो चुके हैं। पंडित विश्व मोहन भी कहने लगे थे कि लोग जा रहे हैं। इसके बाद हम लोग भी अंदर जा रहे थे। तब आयोजकों ने हमें बताया था कि यहां लोग खड़े होकर आपकी प्रशंसा कर रहे हैं।"
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने अपनी संतूर की शिक्षा के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने कहा, "जब मैंने दाखिला लिया और अपनी पढ़ाई शुरू की, तब मैं केवल चार साल का था। मैंने अपने पिता से पूछा था कि मुझे कितने साल तक पढ़ाई करनी होगी। मैं उनसे बार-बार पूछता रहा कि मुझे कितने साल तक पढ़ना पड़ेगा। पिताजी का जवाब आया कि सीखते रहो और सीखते-सीखते ही जान जाओगे कि इसमें कितना समय लगेगा।"
उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को संगीत सिखाएं। अगर वे सीखना न भी चाहें, तो भी उन्हें सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि संगीत एक पॉजिटिव ड्रग जैसा है। उन्होंने कहा, "अगर आप इसका लगातार अभ्यास करते रहते हैं, तो कुछ सालों बाद आपको इसकी एक 'अच्छी लत' लग जाती है और कोई भी नकारात्मकता आप पर असर नहीं डाल पाती। मेरे पास ऐसे छात्र हैं जो सीधे स्कूल से आकर संतूर लेकर बैठ जाते हैं। वे बाहर खेलने नहीं जाते। इसलिए मैं हमेशा सभी बच्चों से कहता हूं कि वे संगीत सीखने की कोशिश करें। भले ही कोई सिर्फ इसे सुने ही, आजकल यूट्यूब पर सब कुछ आसानी से उपलब्ध है। लगातार सुनते रहने से, संगीत के प्रति अपने आप ही एक प्रेम जागृत हो जाता है।"
--आईएएनएस
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