Jagdeep Birth Anniversary : 6 रुपये की दिहाड़ी से लेकर 'सूरमा भोपाली' बनने का सफर: भावुक सीन की वजह से मिला था पहला कॉमेडी किरदार

गरीबी से उठकर 400 फिल्मों तक का सफर, जगदीप ने रचा हास्य का स्वर्णिम इतिहास
6 रुपये की दिहाड़ी से लेकर 'सूरमा भोपाली' बनने का सफर: भावुक सीन की वजह से मिला था पहला कॉमेडी किरदार

मुंबई: हिंदी सिनेमा में हर किसी का अपना दौर रहा है, लेकिन जब हास्य और चरित्र अभिनय के स्वर्णिम युग की बात आती है, तो 'सूरमा भोपाली' के नाम से मशहूर अभिनेता जगदीप का जिक्र प्रमुखता से किया जाता है।

जगदीप के अभिनय में ऐसी जीवंतता थी कि वे अपनी कॉमिक टाइमिंग से किसी भी उदास चेहरे पर मुस्कान लाने का सामर्थ्य रखते थे। वे केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि अपने संवाद अदायगी और चेहरे के विशिष्ट हाव-भावों से हास्य को एक नई परिभाषा देना जानते थे। यही कारण है कि पांच दशकों के अपने लंबे फिल्मी सफर में उन्होंने 400 से अधिक फिल्मों में काम किया। आगामी 29 मार्च को इस दिग्गज अभिनेता की जयंती है।

महज 3 रुपये की दिहाड़ी से बाल कलाकार के रूप में अपना सफर शुरू करने वाले जगदीप ने गरीबी और देश विभाजन की त्रासदी को बेहद करीब से देखा था। दिलचस्प बात यह है कि वे कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। फिल्म 'अफसाना' (1951) की शूटिंग के दौरान जब मुख्य बाल कलाकार उर्दू संवाद नहीं बोल पाया, तब भीड़ का हिस्सा रहे जगदीप ने स्वेच्छा से वह संवाद बोला। उनके इस हुनर को देख निर्देशक इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जगदीप का मेहनताना 3 रुपये से बढ़ाकर 6 रुपये कर दिया और इस तरह उनके फिल्मी करियर का आगाज हुआ।

जगदीप का उच्चारण उर्दू में बहुत साफ था, और यही कारण था कि उन्होंने 9 साल की उम्र में बेहतरीन उर्दू के साथ दरबार में राजा के आने से पहले होने वाली अनाउंसमेंट की। डायलॉग इतनी अच्छी तरीके से बोला गया कि डायरेक्टर ने उन्हें पब्लिक से निकालकर सेट पर दाढ़ी-मूंछ लगाकर पहला किरदार मिला था। इसी नन्हीं सी उम्र में अभिनेता ने ठान लिया था कि अब तो अभिनय ही करना है।

'शोले', 'रोटी', 'एक बार कहो' जैसी फिल्मों में कॉमेडी से लबरेज किरदार निभाने वाले जगदीप ने कई फिल्मों में साइड रोल किए, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि एक रोता हुआ किरदार उन्हें हिंदी सिनेमा का सुनहरा हास्य कलाकार बना देगा। उन्हें हास्य कलाकार बनाने के पीछे निर्देशक बिमल रॉय का बड़ा हाथ था।

1953 से पहले बिमल रॉय 'दो बीघा जमीन' का निर्माण कर रहे थे और उन्हें एक हास्य कलाकार की जरूरत थी। बिमल रॉय ने जगदीप को 'धोबी डॉक्टर' नाम की फिल्म में रोते हुए देखा था। उसी सीन को देखने के बाद बिमल रॉय ने अभिनेता को फिल्म में बूट पॉलिश करने वाले लड़के का किरदार दिया था, जो हास्य से भरा था। बिमल रॉय का मानना था कि जो पर्दे पर रूला सकता है, वही पर्दे पर हास्य कर सकता है क्योंकि रोने वाला गहराई से कॉमेडी करता है और उसे पता है दुख के बाद सुख की अनुभूति कैसे होती है।

--आईएएनएस

 

 

Related posts

Loading...

More from author

Loading...