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गंगा तट पर सौ बरस बाद फिर एक संकल्प की ज़रुरत

गंगा तट पर सौ बरस बाद फिर एक संकल्प की ज़रुरत
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क़रीब सौ बरस पहले हरिद्वार कुंभ में गंगा तट पर लाखों लोगों ने एक संकल्प लिया था और उसे पूरा किया गया था। वह संकल्प था आज़ादी का। आज़ादी और कुंभ का रिश्ता सौ साल पुराना है। ये प्रसंग आज इसलिए प्रासंगिक है कि हरिद्वार में एक बार फिर कंुभ का आयोजन हो रहा है और उधर ये साल आज़ादी की 75 वीं वर्षगांठ के रुप में मनाया जा रहा है।

बीसवीं शताब्दी शुरु होते-होते आज़ादी का आंदोलन काफी जोर पकड़ गया था। अप्रैल 1919 में अंग्रेज सरकार की क्रूरता और अत्याचार के प्रतीक जलियांवाला बाग मंे बहा निर्दोष लोगों का खून, आक्रोश का लावा बनकर देशवासियों की नस-नस में बह रहा था। उधर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन शुरु कर चुके थे। कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में भी असहयोग आंदोलन पर मुहर लग चुकी थी। छात्रों ने स्कूल-काॅलेजों और वकीलों ने अदालतों में जाना छोड़ दिया था। कस्बों और नगरों में मज़दूर हड़ताल पर चले गए। लाखों मजदूरों ने अपने काम से किनारा कर लिया। गांधी-नेहरु के अलावा देशबंधु चितरंजन दास, सरदार पटेल, सरोजनी नायडू, गोपाल कृष्ण गोखले तथा लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति और अनेक क्रांतिकारी अपने-अपने ढंग से आज़ादी के आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए फिरंगी सरकार की रातों की नींद हराम किये हुए थे।

आंदोलन से जुड़े तिलक व गांधी सरीखे बड़े नेताओं ने अपनी आवाज़ आम लोगों तक पहुँचाने के लिए अख़बारों का प्रकाशन शुरु किया तो अनेक अख़बारों के संपादकों ने भी अपनी क़लम स्वतंत्रता आंदोलन को समर्पित कर दी। हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू के अलावा कन्नड़, उड़िया, असमी, पंजाबी, तेलगु, मलयाली, बांग्ला, मराठी आदि सभी भाषायी अख़बारों का ध्येय भी आज़ादी पाना बन चुका था। अख़बारों की ख़बरों और संपादकीय ही नहीं कविताओं में भी अंग्रेज़ सरकार निशाने पर होती थी। इलाहाबाद से प्रकाशित 'स्वराज' के आठ संपादक ढाई साल में आज़ादी की अलख जगाते हुए देश निकाला और काला पानी की सजा पा चुके थे। कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' लगातार जन-जन में स्वराज्य प्राप्ति का मंत्र फंूक रहा था और विद्यार्थी जी को गोरी सरकार बार-बार गिरफ्तार कर जेल भेज रही थी। असंख्य अख़बार आज़ादी के यज्ञ में अपना सर्वस्व होम कर चुके थे। काशी से प्रकाशित दैनिक 'आज' लिख रहा था-''हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए हर प्रकार से स्वतंत्रता पाने का है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते है.....।'' इसके अलावा 'स्वदेश' (गोरखपुर), 'लीडर' (प्रयाग), क्रांतिकारी अजित सिंह का लाहौर से प्रकाशित 'भारतमाता' और 'आजाद', 'कर्मवीर' (जबलपुर) स्वामी श्रद्धानंद का 'श्रद्धा' (हरिद्वार) आदि अनेक समाचार पत्र भी बेखौफ होकर लोगों को लगातार स्वतंत्रता का सपना सच होने का यकीन दिलाते हुए आज़ादी के आंदोलन में प्राण फंूक रहे थे।

स्वतंत्रता के लिए समाज का प्रत्येक वर्ग उद्वेलित और देश में चहुँओर माहौल उद्दीप्त हो चुका था। सो, भला देश का संत समाज इससे अछूता कैसे रह सकता था। संत समाज हरिद्वार कुंभ की बांट जोह रहा था। चूंकि कुंभ एक ऐसे अवसर के रुप में हाथ आने जा रहा था जहाँ बिना आमंत्रण के ही लाखों लोग एक साथ एकत्रित होने थे और गंगा तट से देशभर के लोगों को एक साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता का संदेश देते हुए जनमानस को जगाया जा सकता था। संत समाज को ज्ञात था कि कुंभ में आने से न तो लोगों को रोका जा सकता है और न किसी धर्म सभा में हिस्सा लेने के लिए टोका जा सकता है। गंगा के बीच स्थित प्राचीन श्री गंगा मंदिर के वंशानुक्रम में प्रधान पुजारी और उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार डाॅ.कमलकांत बुधकर के शब्दों में-''कंुभ हमारे देश की महान संस्कृति का एक ऐसा प्रतीक पर्व है जिसमें आने के लिए न तो किसी को कोई चिट्ठी-पत्री भेजी जाती है और न ही कोई बुलावा। फिर भी स्नान के कुछ निश्चित दिवसों पर विभिन्न भाषा-बोलियों और मत मतांतरों को मानने वाले तरह-तरह के परिधानों में लिपटे लाखों-लाख नर-नारी, युवा-वृद्ध आस्था की डोर में बंधकर कुंभ में चले आते हैं और पतित पावनी सुरसरिता में स्नान कर एक सुखद भविष्य की अनुभूति के साथ वापिस लौटते हैं।''

डाॅ.बुधकर बताते हैं कि वर्ष 1921 में हरिद्वार कुंभ के अवसर पर संत समाज द्वारा ''साधु स्वराज्य सभा'' का गठन किया गया था और विभिन्न धर्मसभा स्थलों यहाँ तक कि हर की पौड़ी को भी स्वराज के झंडों से सजाया गया था। समूची पंचपुरी में एक अलग तरह का माहौल बन गया था। अंग्रेज सरकार भौचक्की थी, गोरो को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक ये सब कैसे आयोजित किया गया है। तैयारियों को लेकर 'साधुओं में स्वराज्य की लहर' शीर्षक से स्वामी श्रद्धानंद के अखबार ''श्रद्धा'' में प्रकाशित एक समाचार से उस समय के माहौल का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है - ''हरिद्वारपुरी आजकल धन्य हो रही है। कुम्भ के मेले पर हजारों नर-नारी आये हुए हैं। उद्देश्य कुम्भ का स्नान। परन्तु चर्चा एक ही है, वह है भारत के लिए स्वराज्य की। नर-नारी, सन्यासी, गृहस्थ, वृद्ध, युवा का हृदय इस बात पर खुला हुआ प्रतीत होता है कि भारत को स्वराज्य प्राप्त हो। शाम को हर की पौड़ी पर जाकर देखिए, जगह-जगह स्वराज्य का झंडा और स्वराज्य का प्रचार दृष्टिगोचर होगा। देशभक्त साधुओं ने मिलकर एक 'साधु स्वराज्य सभा' की स्थापना की है और उसकी ओर से व्याख्यान आदि का प्रबंध किया गया है। उस सभा के सभी सभासदों ने प्रतिज्ञा की है कि अपना जीवन भारत के लिए स्वराज्य प्राप्त करने के लिए अर्पण करेंगे। बिना संकोच के यह कहा जा सकता है कि इस आड़े समय में साधुओं का स्वराज्य के कार्य से जुदा रहना जितना निराशाजनक था, इस प्रकार देश सेवा के लिए कटिबद्ध होना उतना ही आशाजनक है। यदि साधु लोग तुल जायें तो घर-घर, ग्राम-ग्राम में स्वराज्यनाद अनायास ही बजा सकते हैं। 13-14 अप्रैल को हरिद्वार में साधु कांग्रेस सभा का अधिवेशन होगा। घोषणा की गयी है कि जगद्गुरु शंकराचार्य उसके सभापति होंगे। भारत को यह समारोह शुभ हो।''

और निर्धारित योजना के अनुसार बैसाखी के दिन संत समाज द्वारा गंगा तट पर जगद्गुरु शंकराचार्य जी की अध्यक्षता में एक विशाल अधिवेशन का आयोजन किया गया। संतों ने अपने उद्बोधन में बाल गंगाधर तिलक के नारे ''स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे'' की मूल भावना के साथ अधिवेशन में उमड़ी भीड़ को स्वतंत्रता का महत्व बताते हुए आज़ादी हासिल होने तक संघर्षरत रहने का संकल्प दिलाया था। माना जाता है कि कुंभ के उसी बैसाखी पर्व पर देश आज़ाद होने का मार्ग प्रशस्त हो गया था। अंग्रेज सरकार को यह समझ आ गया था कि अब हिन्दुस्तान में ज़्यादा दिन राज काज नही चल सकेगा।

एक बार फिर आज़ादी और कुंभ का वह रिश्ता सौ साल बाद अपने आप को दोहरा रहा है। सौ बरस पहले कुंभ में लिया गया संकल्प हम पूरा कर चुके है। सौ बरस बाद स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगाँठ पर आज फिर एक नये संकल्प की ज़रुरत है। यह संकल्प स्वतंत्रता के लिए तो नहीं लेकिन राष्ट्रीय स्वतंत्रता को अक्षुण रखने के लिए होना चाहिए। यह संकल्प उस राष्ट्रीयता के लिए होना चाहिए जिसका ह्रास लगातार हो रहा है। आज हम जाति, धर्म-सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र, वर्ग, अगड़ा-पिछड़ा, गरीब-अमीर के नाम पर अपने-अपने स्वार्थ पूरा करने का खेल-खेल रहे हंै। कभी आरक्षण के नाम पर, कभी किसी कानून के नाम पर धरना-प्रदर्शन करते हुए राष्ट्र और राष्ट्रीयता हमसे कहीं पीछे छूट रहे है। सरकारी वाहनों व सम्पत्तियों को आग के हवाले और उनमें तोड़ फोड़ करने को हमने अपना शक्ति प्रदर्शन मान लिया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम दलगत राजनीति, धर्म-सम्प्रदाय, जाति-वर्ग और भाषा व क्षेत्र से ऊपर उठकर राष्ट्र और राष्ट्रीयता को सर्वोच्च माने तथा किसी भी मुद्दे पर विरोध भी दर्ज करायें तो इस रणनीति के साथ कि राष्ट्रीय संपत्ति या राष्ट्रीयता के भाव को कोई नुकसान न पहुँचे। और यह काम सभी धर्मगुरुओं को अपने-अपने धर्म स्थलों से किया जाना चाहिए। हरिद्वार कुंभ भी एक ऐसा अवसर है, जिसका उपयोग लोगों की सोच बदलने के लिए किया जा सकता है। चूंकि इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हिन्दुस्तान में लोगों की एक बड़ी तादाद आज भी धर्मस्थलों से की जाने वाली अपीलों का अधिक अनुसरण करते है अपेक्षाकृत अन्य लोगों के। धर्मगुरुओं के मुख से कही गयी बात आज भी करोड़ों लोगों के लिए ब्रह्म वाक्य से कम नहीं है।

—दैनिक हाक फीचर्स

Updated : 2021-04-11T16:17:11+05:30
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डाॅ.वीरेन्द्र आज़म

डाॅ. आजम जाने-माने साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।


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