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डरावनी है कोरोना की दूसरी लहर

डरावनी है कोरोना की दूसरी लहर
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देश में कोरोना वायरस की मौजूदा लहर ज्यादा तीव्र और घातक साबित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी संक्रमण और फैलेगा और मृत्यु-दर भी बढ़ेगी। नीति आयोग के सदस्य एवं कोरोना टास्क फोर्स के प्रमुख डा. विनोद पॉल ने चेताया है कि आगामी चार सप्ताह बेहद नाजुक हैं। हमारे देश में जहां इतनी अधिक आबादी है, वहां स्थिति नियंत्रण में थी, तो यह कैसे अनियंत्रित हो गई, यह सोचने वाली बात है। हम इस मामले में अन्य देशों की तुलना में बहुत अच्छी स्थिति में थे। यह हमारी लापरवाही का परिणाम है कि यहां कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और जीवन प्रभावित हो रहा है।

पहली लहर का पीक 17 सितंबर को था, जब करीब 97 हजार केस सामने आए थे। उसके मुकाबले दूसरी लहर में 8 अप्रैल को 1 लाख 31 हजार 878 नए केस सामने आए हैं। पिछले साल वायरस के शुरू होने से लेकर अब तक एक दिन के अंदर मिले मरीजों की ये संख्या सबसे अधिक है। मौतें भी 802 हो गई हैं। बीते वर्ष 17 अक्टूबर के बाद ये पहली बार है जब एक दिन के अंदर 800 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। 17 अक्टूबर को 1032 मरीजों ने जान गंवा दी थी। कुल सक्रिय मरीजों का आंकड़ा 8 लाख को पार कर चुका है। देश में मरीजों के मिलने की रफ्तार भी बढ़कर 9.21 फीसदी हो गई है। मतलब अब हर 100 लोग में 9 कोरोना से संक्रमित पाए जा रहे हैं। यह औसत राजधानी दिल्ली में भी 5.5 फीसदी के पार जा चुका है। नए केसेज को लेकर जो स्टडी हुई है, उसके अनुसार बदलते स्ट्रेन की वजह से लक्षण भी बदल रहे हैं।

शुरू में लग रहा था कि महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों में ही उसका असर रहेगा लेकिन देखते-देखते पूरा देश उसकी गिरफ्त में आ गया। इस बार उसकी गति बहुत तेज होने से चिकित्सा प्रबंध कम पडने लगे हैं। कहीं वेंटीलेटर की कमी है तो कहीं ऑक्सीजन की। अस्पतालों में बिस्तरों का अभाव होने से मरीजों को घर पर रहकर इलाज करने की सलाह दी जा रही है। गम्भीर मरीजों को लगाये जाने वाले रेमडेसिवर इंजेक्शन की उपलब्धता भी पर्याप्त नहीं है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिस तरह सरकार कोरोना की वापिसी को लेकर निश्चिन्त हो चली थी उसी तरह चिकित्सा जगत भी उसके पलटवार को लेकर बेफिक्र सा था। आम जनता की लापरवाही तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र को दर्शाती ही है। ऐसे में कोरोना को भी तेजी से पांव फैलाने का अवसर मिल गया।

बीते 16 जनवरी को हेल्थकेयर वर्कर्स को टीका लगाने के साथ ही देश में कोरोना टीकाकरण की शुरुआत हुई थी। 2 फरवरी से फ्रंटलाइन वर्कर्स को भी वैक्सीन लगने लगी थी। 1 मार्च 60 वर्ष से ऊपर के और 45-59 वर्ष के गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को वैक्सीन लगने लगी थी। इस बीच, कोरोना की दूसरी लहर हावी हुई और सरकार ने 1 अप्रैल से 45 वर्ष से ऊपर के सभी लोगों को वैक्सीनेशन में शामिल कर लिया। देशभर में अब तक 8.24 करोड़ लोगों को पहला डोज और 1.18 करोड़ लोगों को दूसरा डोज दिया जा चुका है। इन्हें मिलाकर अब तक 9.43 करोड़ डोज दिए जा चुके हैं। महाराष्ट्र और राजस्थान के बाद सबसे ज्यादा वैक्सीन डोज गुजरात में दिए गए हैं। यहां अब तक 84 लाख से ज्यादा डोज दिए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश में भी 81 लाख से ज्यादा डोज दिए गए हैं। पीएम मोदी ने मुख्यमंत्रियों से अगले 2-3 हफ्ते में वायरस के प्रसार को रोकने के लिए युद्धस्तर पर काम करने की अपील की है। पीएम ने 11 से 14 अप्रैल तक देश में वैक्सीन महोत्सव मनाने का भी आह्वान किया ताकि अधिक से अधिक पात्र लाभार्थियों को टीका लग सके।

वस्तुतः जैसे ही टीकाकरण शुरू हुआ वैसे ही आम जनता में ये अवधारणा प्रबल हो उठी कि उनके पास कोरोना से बचाव का रक्षा कवच आ गया है। लेकिन अभी तक जितने लोगों को टीके लगे हैं उस गति से तो ये काम पूरा होने में लंबा समय लगेगा। ऐसे में जो सामान्य तरीके हैं वे ही बचाव में सहायक होंगे जिनकी उपेक्षा करने का दुष्परिणाम देश भोग रहा है। टीका लगने के बाद भी अनेक लोगों को लापरवाही महंगी पड़ी है। लेकिन जनता को कसूरवार ठहराने मात्र से काम नहीं चलेगा क्योंकि राजनीति भी उसे लापरवाह बनाने में सहायक है। मसलन राजनीतिक जलसों में कोरोना शिष्टाचार की जिस बेहयाई और दबंगी से धज्जियां उड़ाई जाती हैं वह भी संक्रमण के फैलाव की बड़ी वजह है। चुनाव वाले राज्यों में तो लगता ही नहीं कि कोरोना का कोई डर है। दिल्ली उच्च न्यायालय पूछ रहा है कि प्रचार करने वाले नेता मास्क क्यों नहीं लगा रहे ? राजनीति का आलम ये है कि प्रधानमन्त्री द्वारा कोरोना पर विचार करने बुलाई गई आभासी बैठक में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी हिस्सा नहीं लेंगीं। पहले भी ऐसा हो चुका है। हाल ही में पंजाब सहित कुछ राज्यों में राजनीतिक जलसों पर भी रोक लगाई गयी है। 2 मई को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद आगामी वर्ष के मुकाबलों के लिए मैदान सजने लगेगा। राजनीतिक दलों के अपने स्वार्थ हैं। लेकिन मौजूदा हालात में लोगों की जान के साथ अर्थव्यवस्था को बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

बीते एक महीने में जिस तरह से संक्रमण ने सुरसा जैसा मुंह फैलाया उसके बावजूद लॉक डाउन लगाने के फैसले को प्रदेश और स्थानीय प्रशासन के जिम्मे छोडने पर केंन्द्र सरकार से पूछा जा रहा है कि जब संक्रमितों का दैनिक आंकड़ा सवा लाख से भी अधिक हो चुका है जिसमें आगे भी वृद्धि की पूरी सम्भावना है तब भी वह इस बारे में उदासीन क्यों है? जानकारों के अनुसार, जिस कारण से केंद्र सरकार देश भर में लॉक डाउन लगाने से पीछे हट रही है वह है अर्थव्यवस्था। बीते वर्ष अनेक महीनों तक अधिकांश उद्योग-व्यापार बंद पड़े रहने से अर्थव्यवस्था के चिंताजनक स्थिति में आने से विकास दर नकारात्मक दिशा में बढ़ गई। दिवाली के समय लॉक डाउन हटने पर आर्थिक गतिविधियों ने दोबारा गति पकड़ी जिसका असर जीएसटी संग्रह में लगातार हुई वृद्धि के रूप में सामने आया।

इसीलिये प्रदेश सरकारें नयी लहर पर काबू पाने के लिए नाइट कफ्र्यू और लाॅकडाडन का सहारा ले रही हैं। लेकिन नाइट कफ्र्यू या लॉकडाउन की तालाबंदी की दहशत और चिंता इतनी है कि कई स्थानों पर कोचिंग सेंटर और अन्य शिक्षण संस्थानों के लोगों ने असहमति के स्वर उठाने शुरू कर दिये हैं। खुदरा चेन, होटल, रेस्तरां, ढाबा चलाने और इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर के कारोबार से जुड़े व्यापारियों ने सरकारों को चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि या कफ्र्यू और तालाबंदी को आसान करें या वापस लें अथवा व्यापारी सड़कों पर उतरने को विवश होंगे। फैक्टरियों, मिलों और पॉवरलूम पर ताले लटकने शुरू हो गए हैं। हालांकि कुछ उद्योग अपने मजदूरों को वेतन, खाना और आवास की सुविधाएं उपलब्ध करवा रहे हैं। लेकिन यह कब तक संभव होगा? मजदूरों के एक तबके ने अपने गांव लौटना भी शुरू कर दिया है। कोरोना वायरस अनिश्चित है, लिहाजा आदमी कब तक घर में कैद रहेगा या कारोबार की तालाबंदी करता रहेगा? आम नागरिक में निराशा, कुंठा के साथ-साथ उकताहट भी पैदा होने लगी है, लिहाजा वह तल्ख प्रतिक्रिया देने लगा है।

नाइट कफ्र्यू या तालाबंदी से क्या हासिल किया जा सकता है? बेशक उनसे संक्रमण की चेन कुछ हद तक टूट सकती है, लेकिन यह अधूरा समाधान है। रात के बाद सामान्य दिन शुरू होना है और फिर आम आदमी को बाहर काम पर जाना ही होगा, सामाजिक और सार्वजनिक मेल-मिलाप भी होगा, जब तक हम कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं करेंगे, तब तक संक्रमण को समाप्त कैसे किया जा सकता है? सरकारें और अदालतें भी विवेक याद रखें और उसके मुताबिक अपने दायित्व निभाएं। फिर भी यह लड़ाई अनिश्चित और अंतहीन रहेगी, विशेषज्ञों का ऐसा मानना है। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद देश के पास पहले की अपेक्षा बेहतर अनुभव और बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं। हमें लॉकडाउन की अवधि याद करनी होगी और उस समय हमारे द्वारा बरती जाने वाली सावधानियों को फिर से अपनाना चाहिए।

—दैनिक हाक फीचर

Updated : 9 April 2021 9:56 AM GMT
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