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आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने हड्डियों के फ्रैक्चर के इलाज के लिए किया बायोरीएब्जॉर्बेबल और किफायती ऑर्थाेपेडिक इम्प्लांट सिंथेसाइज

आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने हड्डियों के फ्रैक्चर के इलाज के लिए किया बायोरीएब्जॉर्बेबल और किफायती ऑर्थाेपेडिक इम्प्लांट सिंथेसाइज
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रुड़की (दैनिक हाक): आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने हड्डियों के फ्रैक्चर के इलाज के लिए बायोरीएब्जॉर्बेबल और किफायती ऑर्थाेपेडिक इम्प्लांट सिंथेसाइज किया है।

हड्डियों के वर्तमान इलाज में ग्राफ्रट वाले हिस्से में बैक्टीरिया का संक्रमण एक आम समस्या रही है। इससे हड्डियों के अलग-अलग हिस्सों के जुड़ने में त्रुटि रह जाती है और शुरुआती ग्राफ्रट को निकालने या संक्रमण मुत्तफ़ करने के लिए दुबारा सर्जरी करनी होती है। पर अब एक अधिक सक्षम बैक्टीरियो रोधी मेम्ब्रेन की मदद से बेहतर उपचार की संभावना बनी है। हड्डी दुबारा बनने की इस प्रक्रिया में मैकेनिकल शत्तिफ़ और ऑस्टियोकंडक्टिवीटी भी बढ़ेगी। इस संबंध में इंटरनेशनल र्जनल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोम ोलेक्यूल्स और आरएससी एडवांसेज में दो स्वतंत्र अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।

अध्ययन का मकसद नैनो- हाइड्रॉक्सीपेटाइट की स्थिर मात्र (5 प्रतिशत) के साथ चिटोसन (सीटीएस) के पॉलीमर मैट्रिक्स में हैलोसाइट नैनोटड्ढूब्स (एचएनटी) और टीआईओ2 मात्र का अनुकूलन करना है ताकि कुदरती हड्डी के एक्स्ट्रा सेल्युलर मैट्रिक्स को मैकेनिकल और बायोलॉजिकल माइक्रो इन्वायरनमेंट मिलने के साथ-साथ अधिक बैक्टीरिया-रोधी क्षमता प्राप्त हो। वर्तमान क्लिनिकल ग्राफ्रिटंग में ऑपरेशन के बाद संक्रमण और संबंधित हड्डी एवं आसपास के कोमल टिश्यू के अनावश्यक चिपकने का खतरा रहता है। यह अधिक सक्षम बैक्टीरियो रोधी मेम्ब्रेन आपरेशन के बाद बैक्टीरिया के संक्रमण से खुद लड़ेगा। इसके लिए किसी उपचार या सर्जरी की जरूरत नहीं होगी इसलिए इलाज का खखर्च और स्वस्थ होने में समय दोनों कम लगेंगे। मैकेनिकली मजबूत मेम्ब्रेन एक दीवार बन कर हîóी को मूल आकार में कायम रखेगा और इससे संबंधित हड्डी एवं आसपास के कोमल टिश्यू के अनावश्यक चिपकने का खतरा नहीं रहेगा। ये अध्ययन वर्तमान मानक उपचार की इन दो समस्याओं को दूर करने की प्रेरणा से किए गए,'' सारीम खान ने बताया जो दोनों अध्ययनों के प्रथम लेखक हैं।

इस अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि चिटोसन मैट्रिक्स में उचित मात्र में कुदरती क्ले मिनरल (हैलोसाइट) मिलाने से बायोरीएब्जॉर्बेवल मेम्ब्रेन बनता है जो मनुष्य में टिश्यू के दुबारा बनने के लिए बहुत उपयुत्तफ़ है। अध्ययन में यह दिखाया गया है कि यह मेम्ब्रेन हड्डी के दुबारा बनने के दृष्टिकोण से ऑस्टियोब्लास्ट (हड्डी के सेल) के लिए बहुत अनुकूल है। इस मेम्ब्रेन में बैक्टीरिया से लड़ने की ज्यादा शत्तिफ़ है इसलिए ऑपरेशन के बाद संक्रमण का खतरा भी कम होगा। इन गुणों के अतिरित्तफ़ इस मेम्ब्रेन में 67 एमपीए का ज्यादा टेंसाइल स्ट्रेंथ और अधिक लचीलापन भी है। इसलिए इस मेम्ब्रेन को थकान के दैनिक चक्र में भी नुकसान नहीं पहुंचेगा। मेटल के प्रचलित स्टेंट और प्लेट के बदले ये मेम्ब्रेन लगाए जा सकते हैं जो उनसे बहुत (300 गुना) सस्ता भी है और स्टेंट एवं प्लेट की तरह इस मेम्ब्रेन को निकालने के लिए दूसरी बार सर्जरी की भी जरूरत नहीं होगी क्योंकि मेम्ब्रेन बायोरी एब्जॉर्बेवल है। यह मेम्ब्रेन प्रचलित ग्राफ्रट की कई समस्याएं दूर करेगा जैसे डोनर साइट पर रुग्णता का खतरा, ग्राफ्रट मटीरियल का अभाव, इम्युनेजेनिक रिजेक्शन। शोध बताते हैं कि 50 साल से अधिक उम्र की 20 प्रतिशत भारतीय महिलाओं को ऑस्टोपोरोसिस और इसलिए फ्रैक्चर का ज्यादा खतरा है। पर कम लागत के इस विकल्प से उनका इलाज आसान हो जाएगा। शोध में लगी यह टीम वर्तमान में उद्योगों के साथ मिल कर क्लिनिकल ट्रॉयल पर कार्यरत है ताकि यह विकल्प बाजार में उपलब्ध हो जाए।


Updated : 28 Dec 2019 12:40 AM GMT
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